शनिवार, 5 दिसंबर 2020

भारतीय फिल्मोद्योग व सहित्य-समाज की असम्वेदनशील इतिहास-विमुखता व नवीन प्रकल्प : (डॉ) कविता वाचक्नवी

भारतीय फिल्मोद्योग व सहित्य-समाज की असम्वेदनशील इतिहास-विमुखता व नवीन प्रकल्प :  कविता वाचक्नवी©


गत दिनों किसी ने एक साहित्यिक समूह में  जानकारी चाही कि विभाजन पर हिन्दी में कितने उपन्यास लिखे गये हैं। ग्लानि की बात है कि आँकड़ा दो दर्जन तक भी खींच-खाँच कर कहीं पहुँचता-न पहुँचता है । फिल्मों की बात करें तो स्थिति और भी नगण्य है।

Hollywood व ब्रिटिश फ़िल्म इण्डस्ट्री ने यहूदियों के नरसंहार, टर्की द्वारा आर्मेनिया पर किये पैशाचिक संहार, विश्वयुद्धों में हुए संहार व  फिर अमेरिका में सितम्बर 11/ 2001 के आतंक पर हजारों-हजार  फिल्में बनाई हैं, सभी एक-से-बढ़-कर-एक अद्भुत, मार्मिक व तथ्यपरक। एक-एक भुक्तभोगी व प्रत्यक्षदर्शी की कथा को सहेजा, मूर्त व संरक्षित किया गया है। जनसंहार के प्रमाणों  को जुटा, एकत्र कर कइयों म्यूजियम बनाए गए हैं सहेजने के लिए, स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रमों तक मेँ जनसंहार की कथाएँ पढ़ाई जाती हैं। 

इस पर विस्तार से लिख सकती हूँ कि क्या, कैसा व कितना महत्वपूर्ण व विशेष है यह रूपान्तरण।

बहुत आश्चर्य, क्षोभ व दुःख का विषय है कि किसी भी भारतीय सिनमोद्योग ने न तो भारत विभाजन की त्रासदी पर व न ही कश्मीर में हुए पण्डितों के समूल नरसंहार पर, न सिखों के जनसंहार पर, न आतंकवादी घटनाओं में घटे पर ऐसा कुछ यत्न किया, सोचा या रचा।

बॉलीवुड वाले अनारकली और मुग़लेआजम से लेकर रोमांस एवं भक्तिभाव की फिल्में व कुछेक समाज-सुधार व देशप्रेम के सन्देश की इनी-गिनी फिल्मों की पेंगों मेँ ही उलझे उलझाए रहे जनता को । जनता व इंडस्ट्री दोनों ही इस अत्यन्त सशक्त माध्यम को केवल मनोरञ्जन  का माध्यम समझते-मानते रहे। उन्हें अपनी कमाई, अपनी चमक व  लोकेषणा की सिद्धी अधिक वरेण्य लगी। भीषण अनुत्तरदायी काल व रवैया रहा। भविष्य व इतिहास उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा। 

उस त्रासद इतिहास के भुक्तभोगी अधिकांश लोग अब धरती से जा चुके। कश्मीर के भुक्तभोगी परिवारों के लोग भी अधिकांश नहीं बचे। जो उस समय बालक थे वे ही कुछ रह गये हैं, उस काले इतिहास के साक्षी। हम अपने इतिहास का प्रलेखीकरण (डॉक्युमेंटेशन) करने में इतने पिछड़े रहे हैं कि सैंकड़ों आतंकी हमलों, सिखों के संहार, खालिस्तान के आतंक, भारत-विभाजन, कश्मीर के हिन्दू नरसंहार, ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा किये जनसंहार आदि को चुपचाप पचा गये और कभी एक-एक भुक्तभोगी से उसकी कथा नहीं जानी। जिनके साथ घटा, वे भी कभी उद्यत नहीं हुए कि उसे कलमबद्ध किया जाए। यही एटीट्यूड अपनाया कि लिखने से क्या होगा, किसे आवश्यकता है उन दुर्दान्त संस्मरणों को जानने की। किन्तु कभी इतिहास व भविष्य के प्रति दायित्वबोध से नहीं सोचा। करना तो बहुत दूर की बात है।

इस लेख के माध्यम से मैं ऐसे किसी भी आतंक, संहार आदि के साक्षी, भुक्तभोगी रहे प्रत्येक व्यक्ति से यह आग्रह करना चाहती हूँ कि वे अपने संस्मरणों को लिखें, न सम्भव हो तो ऑडियो रेकॉर्ड करें-करवाएँ। आपके साथ जो हुआ वह आपका नहीं, समाज व राष्ट्र का इतिहास है, उसे संरक्षित करने का दायित्व आपका है। भले ही आपके जीवित रहते कोई उसका नोटिस ले-न ले। आप उसे मुझ तक पहुँचा सकें तो मैं अपने तईं उसके प्रकाशन व -प्रचार का प्रबन्ध करुँगी। उसके अनुवादों के लिए लोगों से हाथ-पाँव जोड़ व्यवस्था करवाऊँगी। वे औपन्यासिक कथाएँ दृश्य माध्यम पर आ सकें इसका भरसक यत्न जीते-जी करूँगी। बस आपको एक दम यथातथ्य सत्य, विस्तार पूर्वक, सम्पूर्ण विवरण के साथ सहेजना है, प्रामाणिकता के साथ किञ्चित भी छेड़छाड़ न हो।

दूसरा आह्वान मैं योरोप व नॉर्थ अमेरिका के भारतीय मूल के समृद्ध परिवारों व व्यक्तियों से करना चाहती हूँ। हमें एक समानान्तर फ़िल्म इण्डस्ट्री खड़ी करनी है, जिसमें हमारे अपने अभिनेता-अभिनेत्रियाँ हों, हमें भारत का मुख नहीं देखना व न ही अपना धन उस मनोरञ्जन पर अपव्यय करना है। आप अपना धन इनवेस्टमेण्ट के रूप में और दान के रूप में ऐसे प्रोजेक्ट्स में लगाइये। आप में से जो भी ऐसी योजनाओं में भागी बनना चाहें, कृपया जुड़ें, मैं गम्भीरता से इस दिशा में कुछ प्रोजेक्ट्स पर काम करने की योजना बना रही हूँ। आप अपनी भूमिका तय कीजिये कि कैसे सहयोग कर सकते हैं। 


हमें मिल कर इस दिशा में बहुत कार्य करने शेष हैं,अन्यथा हमारे पास बहुत शीघ्र प्रामाणिक साक्षियों का अभाव होने वाला है। जो लेखक उच्चकोटि का प्रलेखीकरण करने में भागी बन सकते हैं, वे भी मुझ से सम्पर्क करें। उनका स्वागत है।


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