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मंगलवार, 21 जुलाई 2020
आमन्त्रण : युद्ध अनवरत शेष हमारे : कवि सम्मेलन
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
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12:23 am
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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020
एक घरौंदा मेरे भीतर : विश्वम्भरा अन्तर-राष्ट्रीय कवयित्री सम्मेलन
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
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9:03 pm
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Kavita Vachaknavee
शुक्रवार, 1 मई 2020
विश्वम्भरा : वर्तमान कलेवर
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
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11:51 pm
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आज हम कहाँ हैं : आचार्य कविता वाचक्नवी
शनिवार, 19 अप्रैल 2014
सिओल में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन-2014 संपन्न
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
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1:31 pm
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13 से 15 मार्च 2014 तक हन्गुक यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज, सिओल, दक्षिण कोरिया में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस 3 दिवसीय सम्मेलन का आयोजन विदेश मंत्रालय, भारत सरकार और भारतीय दूतावास, सिओल के सहयोग से किया गया।
सम्मेलन का उद्देश्य ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, भारत और कोरिया समेत समस्त एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हिन्दी भाषा के शिक्षण और अध्यापन को बढ़ावा देना था। दो दिन के 5 अकादमिक सत्रों में कुछ 18 आलेख पढ़े गए।
उद्घाटन समारोह का संचालन भारत अध्ययन विभाग से प्रोफेसर लिम गन दोंग ने किया। सिओल से कुछ दूर हन्गुक यूनिवर्सिटी के ग्लोबल परिसर योंगिन में आयोजित सम्मेलन में स्वागत भाषण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर किम इन छल ने दिया।
उद्घाटन संबोधन दक्षिण कोरिया में भारत के राजदूत महामहिम विष्णु प्रकाश ने दिया। हिन्दीसेवी सम्मान प्राप्तकर्ता और विभाग के प्रोफेसर एमेरिटस प्रोफेसर ली जंग हो ने 'भारत और हिन्दी की याद' शीर्षक स्मृति चित्र प्रस्तुत किया।
पहले अकादमिक सत्र में 4 वक्ता थे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति विभूतिनारायण राय ने 'विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ाने में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय का योगदान' शीर्षक आलेख पढ़ा।
ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी से प्रोफेसर पीटर फ्रीडलैंडर ने 'ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी : अतीत, वर्तमान और भविष्य' शीर्षक के अपने आलेख की पावर पॉइंट प्रस्तुति में ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी शिक्षण के ऐतिहासिक विकास क्रम को स्पष्ट करते हुए विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी अध्यापन के लिए टास्क बेस्ड लर्निंग, ऑडियो-लिंगुअल और कम्युनिकेटिव स्टाइल ऑफ टीचिंग की अवधारणा को रेखांकित किया।
तीसरी वक्ता के रूप में हन्गुक यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज से प्रोफेसर विजया सती ने अपने आलेख 'बुदापैश्त में हिन्दी अध्यापन : कुछ स्मृतियाँ' में ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त में अपने अध्यापन काल के अनुभव साझा किए। सत्र की अंतिम वक्ता हन्गुक यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज की प्रोफेसर किम ऊ जो ने 'दक्षिण कोरिया में हिन्दी शिक्षण : 40 वर्ष का सफर' शीर्षक अपने आलेख में कोरिया में हिन्दी शिक्षण के विकास को विस्तार सहित प्रस्तुत किया।
दूसरे अकादमिक सत्र में विषय रखा गया था- 'हिन्दी एवं उसका विकास'। अध्यक्षता एवं संचालन प्रो. छोई जोंग छान ने किया। प्रथम वक्ता के रूप में चीन के शिआन इंटरनेशनल स्टडीज विश्वविद्यालय से आए प्रो. गे फुपिंग ने 'भारतीय लोगों का सांस्कृतिक मनोविज्ञान और हिन्दी व्यवहार की विशेषताएँ' शीर्षक से आलेख पढ़ा। हन्गुक विश्वविद्यालय से डॉ. क्षिशतोफ इवानेक ने 'विद्या भारती स्कूलों में हिन्दी भाषा अध्यापन' पर आलेख पढ़ा। हन्गुक विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से प्रो. हृदयनारायण के आलेख का शीर्षक था- 'हिन्दी और राष्ट्रवाद।'
दूसरे दिन तीसरे अकादमिक सत्र में हन्गुक विश्वविद्यालय से प्रो. लिम गन दोंग ने 'हिन्दी शिक्षण में संस्कृत शिक्षा का योगदान', जापान के दाइताबुंका विश्वविद्यालय से प्रो. हिदेआकी इशिदा ने 'हिन्दी शिक्षण में लोककथाओं की उपयोगिता', दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. सारस्वत मोहन मनीषी ने 'हिन्दी साहित्य शिक्षण में तुलसीदास की उपयोगिता' और पेकिंग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. जियांग कुई ने 'भारतीय ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद' शीर्षक आलेख पढ़े।
चौथे अकादमिक सत्र में पहला आलेख प्रो. फुजिइ ताकेशी ने प्रस्तुत किया, जो टोकियो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज से थे, शीर्षक था- 'डिजिटल युग में हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्ययन- अध्यापन'।
हन्गुक विश्वविद्यालय के प्रो. ली उन गू ने 'हिन्दी फिल्मी गीतों के माध्यम से हिन्दी शिक्षण' विषय पर अपने विचार रखे। प्रो. रामबक्ष के आलेख का शीर्षक था- 'भूमंडलीकरण और हिन्दी का अध्ययन।'
पांचवें अंतिम सत्र में प्रथम वक्ता केंद्रीय हिन्दी संस्थान भारत से प्रो. मोहन ने 'हिन्दी सीखने वाले कोरियाई विद्यार्थियों का अधिगम-व्यवहार और अपेक्षाएँ' शीर्षक से अपनी बात कही।
ओसाका विश्वविद्यालय जापान से प्रो. चिहिरो कोइसो ने 'हिन्दी शिक्षा में पढ़ने वालों की अभिप्रेरणा कैसे बढ़नी चाहिए' विषय पर संवाद किया। खो थे जीन बुसान विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से थे जिन्होंने 'कोरिया में हिन्दी : अध्यापन एक अनुभव' शीर्षक से वक्तव्य दिया। प्रो. हु रुई ग्वांगदोंग विदेश अध्ययन विश्वविद्यालय चीन से आए थे और उन्होंने 'अभाव पूर्ति सिद्धांत की दृष्टि से हिन्दी शिक्षा पर कुछ विचार' प्रस्तुत किए।
सम्मेलन के समापन समारोह की अध्यक्षता और संचालन हन्गुक विश्वविद्यालय से प्रो. किम ऊ जो ने किया जिसमें पहले सभी अकादमिक सत्रों की संक्षिप्त रिपोर्ट प्रो. मोहन और प्रो. पीटर फ्रीहलैंडर ने प्रस्तुत की। समापन वक्तव्य उपसचिव, विदेश मंत्रालय, सुनीति शर्मा और भारतीय दूतावास सिओल के भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की निदेशक निहारिका सिंह ने दिया।
प्रस्तुति : विजया सती
बुधवार, 4 सितंबर 2013
प्रथम हिन्दी>अंग्रेजी व्याकरण के लेखक नहीं रहे
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
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6:20 pm
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नहीं रहे प्रो. Ronald Stuart McGregor : कविता वाचक्नवी
न्यूजीलैंड में जन्मे व स्कॉटिश माता-पिता की सन्तान प्रो. McGregor को बालपन में फ़िजी से प्रकाशित हिन्दी के एक व्याकरण की प्रति किसी ने दी थी, जिसने उनके जीवन का रुख हिन्दी की ओर मोड़ दिया। 1964 से 1997 तक में वे केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाते रहे। सर्वप्रथम 1959-60 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी की पढ़ाई करने वे भारत आए थे।
उनका पीएच.डी. शोध 1968 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था "The Language of Indrajit of Orchā - A Study of Early Braj Bhāsā Prose"। ( ध्यातव्य है कि इंद्रजीत स्वयं ब्रज भाषा के ख्यात कवि थे और वे ही प्रसिद्ध कवि केशवदास के संरक्षक भी थे )।
यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि इस भाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करवाने वाले एक विद्वान के निधन पर हिन्दी क्षेत्र में किसी ने एक शब्द तक 20 दिन में नहीं लिखा, यद्यपि भारत के एक अंग्रेजी समाचारपत्र में अंग्रेजी के पूर्व प्रोफेसर (दिल्ली वि. वि.) ने एक लेख अवश्य लिखा है। उस लेख को भी यहाँ अंत में पढ़ा जा सकता है ।
उनकी कुछ कृतियों की सूची यों है -
- 1) -The Oxford Hindi-English Dictionary / published 1993 — 2 editions
- 2) - Shorter Oxford English Dictionary by R.S. McGregor, Lesley Brown (Editor) / published 2002
- 3) - Outline of Hindi Grammar: With Exercises / published 1972 — 5 editions
- 4) - Exrcss Spoken Hindi Cassette
- 5) - Devotional Literature in South Asia /published 1992 — 2 editions
- 6) - The Language of Indrajit of Orch: A Study of Early Braj Bhāsā Prose (University of Cambridge Oriental Publication / published 1968 — 2 editions
- 7) - Exercises In Spoken Hindi by R.S. McGregor, A. S. Kalsi / published 1971
- 8) -The Round Dance Of Krishna, And Uddhav's Message by NandDas, R.S. McGregor / published 1974
प्रो. Ronald Stuart McGregor विषयक एक लेख नीचे देखेँ -
The storyteller of Hindi
Harish Trivedi : Sat Aug 31 2013, 04:23 hrshttp://www.indianexpress.com/news/the-storyteller-of-hindi/1162437/0
McGregor chronicled the emergence of Hindi as the great popular language of north India.Ronald Stuart MCGREGOR taught Hindi at the University of Cambridge from 1964 to 1997, and was a fellow of Wolfson College there until he passed away on August 19. He had earlier taught at the School of Oriental and African Studies at the University of London. A philologist, grammarian, literary historian, translator and lexicographer of the front rank, he probably did more for Hindi studies in the West than any other scholar of his generation.
McGregor was born of Scottish parents in New Zealand, where he took his BA in English. On a scholarship to Oxford, he studied early English philology but then turned to learning Hindi, a language to which he dedicated the rest of his life. He had, as a teenager in New Zealand, been given a copy of a Hindi grammar book published in neighbouring Fiji, where migrant Indians formed a large part of the population. That wind-blown seed grew into a mighty tree.
McGregor first visited India in 1959-60 to study Hindi at the University of Allahabad. He had already met in London a student of Indian history, Elaine, who was now researching at Calcutta; they got married there in 1960.
McGregor's PhD thesis was published as The Language of Indrajit of Orchha (1968). No one had heard of this Indrajit, a minor prince who was a patron of the major poet Keshav Das (1555-1617) but also himself a pioneering writer of prose in Braj bhasha. This early discovery was characteristic of McGregor's scholarly method: not to lose sight of the minor in the glare of the canonical, and to see the text in its wider context, including its vital social and cultural affiliations.
As a pioneering language teacher, McGregor produced next An Outline of Hindi Grammar (1972, revised ed. 1995), which remains a standard work of reference. He then contributed to a multi-volume History of Indian Literature not one, but two volumes on Hindi literature, the first on the 19th and the early 20th centuries (1974), and the second, from the beginning to the 19th century (1984). Together, they constitute probably the most authoritative history of Hindi literature yet available in English.
In these volumes, McGregor sought to modify the periodisation of Hindi literature which Ramchandra Shukla had put in place in his foundational and still canonical history (1929). He gave more space to the early period and paid the same kind of nuanced attention to some minor poets such as Nand Das (whose major works he translated), Vishnu Das and Bhikhari Das as he did to Kabir, Meera or Tulsi.
The work that McGregor is most widely identified with began modestly enough, when the Oxford University Press asked him to update the classic Dictionary of Urdu, Classical Hindi, and English (1884) by John T. Platts. Like many famous sequels, it soon assumed a divergent life of its own. As McGregor noted, the priority and ascendancy of Urdu had long since vanished, there had meanwhile appeared a huge new dictionary, the Hindi Shabd Sagar (1922-29), and altogether, Hindi had "developed dramatically in scope, status and literary versatility". McGregor's Oxford Hindi-English Dictionary (1993), which was 20 years in the making, now stands supreme as the ultimate go-to resource of its kind. Whenever any Hindi-English bilingual is in doubt or distress, she can do no better than "look up McGregor".
His last significant work, a 45-page essay on the "Progress of Hindi" from the 14th to the 19th century (in Literary Cultures in History, edited by Sheldon Pollock, 2003), is in a sense a fine distillation of McGregor's life's work, his gaagar mein saagar (the ocean in an earthen pot). He highlighted here the abiding vitality of Hindi in small but culturally confident centres such as Dalmau, Gwalior, the "Braj district", Orchha and Banaras (in implicit contrast with the metropolitan Persian-Urdu centres of Delhi, Lucknow and Lahore), and the emergence of Hindi finally as the great popular language of north India.
In his dictionary too, McGregor had weaned colonial "Hindustani" lexicography away from its Perso-Arabic genealogy, to ground Hindi meticulously in its etymological basis in Sanskrit and in its vast tadbhava resources of indigenous dialects. Instead of a composite culture, he spoke, acutely and perhaps more accurately, of a "cultural rapprochement" and of a "bipartite culture".
Stuart McGregor was a gentle and modest man, always quietly dedicated to his work. At the end of a lecture I once gave in Cambridge, he took me aside to diffidently ask of me a favour: to find in Delhi and send him a particular Hindi-to-Hindi dictionary that he needed. He graciously acknowledged the receipt of the book in the form of a self-composed doha in Braj bhasha, to express a feeling we could not have shared in English. He was more deeply steeped in Hindi sensibility and literature than many of its contemporary native speakers are, and he did as much to propagate and promote Hindi as anyone.
The writer is a former professor of English, University of Delhi
मंगलवार, 26 मार्च 2013
भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न
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Kavita Vachaknavee
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8:16 pm
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World Hindi Day
डॉ.कविता वाचक्नवी को ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’ प्रदत्त
लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.
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ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण.
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डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त स्मृतिचिह्न और प्रशस्तिपत्र
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डॉ. कविता वाचक्नवी को स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती.
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“जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा
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डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त प्रशस्ति-पत्र
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भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा
“ सम्मान-समारोह"
सम्पन्न
24 मार्च 2013
भारतीय जीवन मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार की संस्था “विश्वम्भरा” की संस्थापक-महासचिव डॉ.कविता वाचक्नवी को विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा इण्डिया हाउस में आयोजित समारोह में “आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान” किया गया। इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त महामहिम डा. जे॰ भगवती ने उन्हें नकद राशि, स्मृति चिह्न, शॉल और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए। उन्हें यह सम्मान मुख्यतः इन्टरनेट व प्रिंट मीडिया द्वारा भाषा, साहित्य, संस्कृति व पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है.
उल्लेखनीय है कि अमृतसर में जन्मीं कविता वाचक्नवी समाज-भाषा-विज्ञान तथा काव्यसमीक्षा जैसे विषयों में 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद' से एमफिल और पीएचडी अर्जित करने के बाद सपरिवार लन्दन में रह रही हैं. भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ कविता वाचक्नवी ने अपने दादाश्री व पिताश्री का विशेष उल्लेख किया व लाहौर से हिमाचल और पंजाब तक उनके किए कार्यों व बलिदानों को उपस्थितों के साथ बाँटते हुए बताया कि कैसे हिन्दी सत्याग्रह में जेल में रहने से लेकर हिमाचल को हिन्दीभाषी राज्य का दर्जा दिलाने तक के लिए उनके परिवार ने कष्ट सहे। वाचक्नवी ने अपना सम्मान उन्हीं को समर्पित करते हुए कहा कि वे यह सम्मान उनके प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर रही हैं। उन्होंने राजदूत व उच्चायोग से अनुरोध किया कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग की वेबसाईट को द्विभाषी बनाया जाना चाहिए व उसे अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी उपलब्ध होना चाहिए।
विज्ञप्ति के अनुसार इस समारोह में दो अन्य विशिष्ट हिंदी सेवियों तथा एक हिंदी संस्था को भी सम्मान प्रदान किए गए. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” से यॉर्क विश्वविद्यालय के विख्यात भाषाविद प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा को तथा “डा॰ हरिवंश राय बच्चन हिन्दी साहित्य सम्मान” से बर्मिंघम के हिंदी लेखक डॉ॰ कृष्ण कुमार को सम्मानित किया गया जबकि नाटिङ्घम की संस्था “काव्य रंग” को “फ़्रेडरिक पिनकोट हिन्दी प्रचार सम्मान” प्रदान किया गया.
उल्लेखनीय है कि अमृतसर में जन्मीं कविता वाचक्नवी समाज-भाषा-विज्ञान तथा काव्यसमीक्षा जैसे विषयों में 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद' से एमफिल और पीएचडी अर्जित करने के बाद सपरिवार लन्दन में रह रही हैं. भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ कविता वाचक्नवी ने अपने दादाश्री व पिताश्री का विशेष उल्लेख किया व लाहौर से हिमाचल और पंजाब तक उनके किए कार्यों व बलिदानों को उपस्थितों के साथ बाँटते हुए बताया कि कैसे हिन्दी सत्याग्रह में जेल में रहने से लेकर हिमाचल को हिन्दीभाषी राज्य का दर्जा दिलाने तक के लिए उनके परिवार ने कष्ट सहे। वाचक्नवी ने अपना सम्मान उन्हीं को समर्पित करते हुए कहा कि वे यह सम्मान उनके प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर रही हैं। उन्होंने राजदूत व उच्चायोग से अनुरोध किया कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग की वेबसाईट को द्विभाषी बनाया जाना चाहिए व उसे अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी उपलब्ध होना चाहिए।
विज्ञप्ति के अनुसार इस समारोह में दो अन्य विशिष्ट हिंदी सेवियों तथा एक हिंदी संस्था को भी सम्मान प्रदान किए गए. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” से यॉर्क विश्वविद्यालय के विख्यात भाषाविद प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा को तथा “डा॰ हरिवंश राय बच्चन हिन्दी साहित्य सम्मान” से बर्मिंघम के हिंदी लेखक डॉ॰ कृष्ण कुमार को सम्मानित किया गया जबकि नाटिङ्घम की संस्था “काव्य रंग” को “फ़्रेडरिक पिनकोट हिन्दी प्रचार सम्मान” प्रदान किया गया.
इस अवसर पर सम्मानितों को बधाई देते हुए सभा को संबोधित अपना वक्तव्य हिन्दी में देते हुए उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती ने कहा कि वे स्वयं असमिया भाषी होते हुए दिल्ली में रहने के कारण हिन्दी में व्यवहार करते रहे हैं व उनकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रही है। उन्होने ज़ोर देकर कहा कि निजी रूप से वे त्रिभाषा नीति को भारत के लिए श्रेयस्कर समझते हैं। विश्व पटल पर भारत से बाहर के लोगों के लिए अंग्रेजी, समस्त भारतीय कार्यकलापों के लिए हिन्दी व अपनी मातृभाषा अथवा एक प्रांतीय भाषा प्रत्येक भारतीय को अवश्य सीखनी पढ़नी चाहिए।
“जॉन गिलक्रिस्ट यू.के.हिन्दी शिक्षण सम्मान” स्वीकार करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा ने अपने वक्तव्य में यॉर्क विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम हिन्दी अध्यापन प्रारम्भ होने सम्बन्धी अपने संस्मरण सुनाए और यूके में हिन्दी अध्यापन से जुड़ी स्थितियों का उल्लेख करते हुए 35 वर्ष के अध्यापन का उल्लेख किया। इसी प्रकार "डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ. कृष्ण कुमार ने भारत में संस्कृत, हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए भावपूर्ण अपील करते हुए चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर आने वाले दिनों में भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
समारोह में “डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी प्रकाशन अनुदान योजना” के अंतर्गत श्रीमती उषा वर्मा को उनकी पुस्तक 'सिम कार्ड तथा अन्य कहानियाँ’ और डा॰ कृष्ण कन्हैया को उनके काव्य संग्रह 'किताब जिंदगी की’ के प्रकाशन हेतु नकद राशि और मानपत्र दिया गया।
लंदन स्थित इंडिया हाउस में हुए इस पुरस्कार समारोह में उप उच्चायुक्त डॉ. वीरेंद्र पाल और उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) एसएस सिद्धू भी उपस्थित थे। सिद्धू जी ने अपना स्वागत वक्तव्य हिन्दी में दिया व धन्यवाद वक्तव्य भी डॉ वीरेंद्र पॉल द्वारा हिन्दी में ही दिया गया। कार्यक्रम का संचालन उच्चायोग के हिन्दी व संस्कृति अताशे श्री बिनोद कुमार ने सफलतापूर्वक किया। ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में समारोह में उपस्थित थे ।
चित्र परिचय –
- 1. लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.
- 2. ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण.
- 3. डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती.
- 4. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा.
[प्रेषक – डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संवीक्षक – ‘विश्वम्भरा’), प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद-500004; मोबाइल – 08121435033]
गुरुवार, 13 सितंबर 2012
हिन्दी और प्रवासी भारतीय
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
पर
6:23 pm
लेबल:
विश्वम्भरा,
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Hindi Literature
आज हिन्दी दिवस पर विशेष
राकेश बी. दुबे
पूर्व सांस्कृतिक अताशे,
भारतीय उच्चायोग, लन्दन
Email- rakeshbdubey@gmail.com
हिन्दी साहित्य की एक अनुषंगी इकाई के रूप में भारत से बाहर रचे जा रहे हिन्दी साहित्य की चर्चा इधर पिछले एक दशक से विभिन्न मंचों पर होने लगी है । यद्यपि, साहित्यकारों और आलोचकों के बीच इस बात पर मतभेद है कि प्रवासी हिन्दी साहित्य की संज्ञा, अनिवासी भारतीयों एवं भारतवंशियों द्वारा रचे गए साहित्य को देना उपयुक्त है भी या नहीं । मतभेद तो इस बात को लेकर भी हैं कि किसी भाषाविशेष में साहित्य को इस प्रकार निवासी एवं प्रवासी साहित्यकारों के खाँचों में बाँटना क्या अभीष्ट है भी । यद्यपि हमारा अभिप्राय इस विषय पर बहस में उलझने का नहीं है और मोटे तौर पर यह मानते हुए कि दीर्घ अवधि से भारत से बाहर रह रहे भारतवंशियों द्वारा जो रचनाएँ, प्रवासकाल में की जा रही हैं या की गई हैं उनका मूल्यांकन एवं परिगणन करने में सुविधा के लिए, इन रचनाकारों को प्रवासी हिन्दी रचनाकार और उनकी रचनाओं को प्रवासी हिन्दी साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है; तथापि, इस मुद्दे पर विद्वत्जनों में चर्चा तो होनी ही चाहिए ।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार सृष्टि के आदि पुरुष महाराज मनु पहले प्रवासी कहे जा सकते हैं । प्रलय के समय उन्हें जम्बू द्वीप छोड़कर आधुनिक मिस्र में जाकर रहना पड़ा था । लिखित इतिहास में सम्राट अशोक के पुत्र एवं पुत्री भी बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए श्रीलंका, हिन्द चीन और चीन के प्रवास पर गए थे । ग्यारहवीं शताब्दी में मलय द्वीप पर एवं हिन्द चीन के देशों आधुनिक कम्बोडिया, इण्डोनेशिया आदि पर अपनी विजय पताका फहराने गए राजराजा चोल एवं राजेन्द्र चोल के साथ गए सैनिकों में से कुछ वहीं बस गए और उनकी संततियों के साथ वर्तमान आन्ध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु के संबंध/सम्पर्क आज तक विद्यमान हैं । परन्तु इस लेख में सुदूर अतीत के प्रवासियों की नहीं अपितु निकट अतीत में अर्थात् पिछले दो सौ वर्षों में देश से गए भारतीयों और उनकी सन्तति द्वारा की गई हिन्दी रचनाओं को शामिल किया जाना अभिप्रेत है ।
यह भी विचारणीय है कि ‘प्रवासी भारतीय’ पद को परिभाषित किए बिना प्रवासी हिन्दी साहित्य पर चर्चा करना सुकर कैसे होगा । प्रवासी है कौन ? कितनी अवधि तक प्रवास करने पर किसी व्यक्ति को प्रवासी की श्रेणी में रखा जाएगा ? पहले पहल उन्नीसवीं सदी में अर्थात् 1834 में मॉरीशस में उतरे पहले प्रवासी भारतीय से लेकर बीसवीं शताब्दी में 1920-21 तक शर्तबन्दी प्रथा के अंतर्गत अर्थात् गिरमिटिया मजदूरों के रूप में मॉरीशस, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, गयाना, फिजी, सूरीनाम आदि में गए भारतीय भी प्रवासी कहे जाते हैं और वर्तमान में रोजगार, शिक्षा एवं प्रव्रजन पर जाने वाले भारतीय भी प्रवासी कहे जा रहे हैं । लगभग 177 वर्ष पहले से लेकर लगभग 90 वर्ष पूर्व तक भारत से गए लोगों की तीसरी नहीं तो चौथी पीढ़ी उन देशों में रह रही है, उनका जन्म, पालन पोषण, शिक्षा-दीक्षा वहीं हुई है; ऐसे में क्या उन्हें भी प्रवासी माना जाए ? इसके विपरीत आधुनिक यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया और अमेरिका में पिछले 50 वर्ष के दौरान रोजगार, पढ़ाई, व्यापार आदि के लिए गए प्रवासियों को भी क्या उसी श्रेणी में रखा जाना उचित होगा ? जैसा कि ऊपर बताया गया है कि इस प्रकार के प्रश्न लगातार उठते रहे हैं और कोई सर्वमान्य समाधान इस बारे में नहीं निकला है । हमें कहीं न कहीं, कोई एक आधार तो तय करना ही होगा इसलिए मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार, इन सभी के भारत से जुड़ाव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि प्रवासी भारतीयों की हमारी संकल्पना उन भारतवंशियों की है जो किन्हीं कारणों से विदेश में कुछ काल के लिए या फिर सदैव के लिए बस तो गए हैं लेकिन उनका भारत से सम्पर्क समाप्त नहीं हुआ है ।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि कुछ सीमा तक भारत में और बड़ी हद तक भारत से बाहर, हिन्दी शिक्षण के लिए विदेशी विद्वानों ने जो कार्य किया है, वह भारतीय मनीषियों द्वारा की गई हिन्दी सेवा से किसी भी प्रकार कम नहीं है। कुछ मामलों में तो वह बढ़कर ही है । लेकिन इस लेख का ध्येय, विदेशी विद्वानों के योगदान से हटकर उन प्रवासियों/भारतवंशियों के योगदान को रेखांकित करने का है जो या तो भारत में जन्मे और बाद में प्रवास पर गए या फिर जिनका जन्म ही भारत से बाहर हुआ है। लेख के प्रारंभ में ही, विषय की सुविधा के लिए इन सबको एक ही श्रेणी में रखने का औचित्य दिया गया है । यद्यपि प्रवासी शब्द को अन्यथा परिभाषित करने के लिए पाठकगण स्वतंत्र हैं ।
मॉरीशस, गयाना, ट्रिनिडाड एवं टुबैगो, सूरीनाम या डच गयाना और फिजी में गए श्रमिकों की अलग पहचान है । इन देशों में गए श्रमिक अधिकांशत: हिन्दी भाषी क्षेत्र अर्थात् पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार से गए थे और उनकी मातृभाषा भोजपुरी एवं अवधी थी । मलेशिया, थाईलैण्ड, म्यांमार, रीयूनियन द्वीप, तंजानिया, उगांडा, जिम्बाम्बे, दक्षिण अफ्रीका और जमैका आदि देशों में भारतीय नागरिक, व्यापारी के रूप में गए लेकिन इनमें जाने वाले अधिकांश भारतीय हिन्दीतर प्रदेश के थे और इस लेख में उनकी चर्चा हमारा अभीष्ट नहीं है । फिर भी, इन देशों में जो हिन्दी साहित्यकार रचनारत हैं या रहे हैं, उनका उल्लेख संक्षेप में यथा स्थान किया जाएगा । यूरोपीय देशों में, साठ एवं सत्तर के दशकों में गए भारतीयों और अमेरिका गए डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों आदि में से कई विद्वान हिन्दी के उल्लेखनीय रचनाकार बने । इसलिए उनका उल्लेख यूरोप एवं अमेरिका के प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों के अंतर्गत किया जाएगा । तीसरी धारा जो अपेक्षाकृत परवर्ती और निकट अतीत की है, वह है: खाड़ी के देशों में गए कुशल/अकुशल श्रमिकों/तकनीशियनों की ।
इस प्रकार भारत से बाहर हिन्दी लेखन को उक्त धाराओं के अनुसार मोटे तौर पर तीन समूहों में रखा जा सकता है: पुरा-प्रवास के देश, नव-प्रवास के देश और भारत के पड़ोसी देश । खाड़ी के देशों को भी भारत के पड़ोसी देशों की श्रेणी में इसलिए रखा जा रहा है कि इन देशों में हिन्दी लेखन की चुनौतियाँ और अवसर, भारत के पड़ोसी देशों - श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार आदि के लगभग समान ही हैं ।
पुरा प्रवास के देश
मॉरीशस
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि भारत से बाहर हो रहे हिन्दी लेखन में मॉरीशस का स्थान सबसे आगे है । वर्ष 1834 से लेकर अब तक यह कार्य किसी न किसी रूप में अविकल जारी है और इसकी गुणात्मकता में ह्रास के स्थान पर वृद्धि ही हुई है । परिमाण की दृष्टि से देखें तो इस छोटे से देश में रचे गए हिन्दी साहित्य को अमेरिका में प्रवासी भारतीयों की विपुल संख्या और उस देश के विशाल भू-भाग में बसे रचनाकारों के समग्र साहित्य से टक्कर लेते देखा जा सकता है । लिखित इतिहास के अनुसार अमेरिकी हिन्दी साहित्य की तुलना में यहाँ का साहित्य बहुविध भी है ।
मॉरीशस में पं. बासदेव बिसुनदयाल से लेकर श्री हेमराज सुन्दर जैसे आधुनिक साहित्यकारों की एक लम्बी परम्परा रही है । इस विस्तृत आकाश में शुक्र तारे की तरह दैदीप्यमान अभिमन्यु अनत जैसे प्रतापी रचनाकार जहाँ बहुश्रुत हैं, वहीं ब्रजेन्द्र भगत मधुकर, डॉ मुनीश्वरलाल चिंतामणि, रामदेव धुरंधर, इन्द्रनाथ भोला बेणीमाधव रामखिलावन, महेश रामजियावन, प्रहलाद रामशरण, के. हजारीसिंह , डॉ बीरसेन जागासिंह और राजेन्द्र अरुण जैसे सितारे चमकते दिखाई देते हैं । मॉरीशस की पहली प्रकाशित रचना है पंडित लक्ष्मीनारायण चतुर्वेदी रसपुंज की ‘रसपुंज कुंडलियाँ’ जो वर्ष 1923 में प्रकाशित हुई थी । चतुर्वेदी जी की ही दूसरी कृति शताब्दी सरोज के नाम से वर्ष 1934 में आई । इस प्रकार पंडित लक्ष्मी नारायण चतुर्वेदी को मॉरीशस का आदि कवि कहा जा सकता है ।
मॉरीशस में भारतीयों का इतिहास खून को पसीना बनाने का इतिहास रहा है । कठिन जलवायु और बीमारियों से भरे इस अनजान टापू पर हिन्दी लेखन की शुरुआत तो उस पत्थर पर ही हो गई बताते हैं जहाँ गोरों से छिपकर प्रवासी मजदूर, पानी से लिखा करते थे । मॉरीशस की पहली पाठशालाएँ, उन बैठकाओं को माना जा सकता है जो रात के अंधेरे में प्रवासी मजदूरों के गुप्त मिलन के साक्षी बने और जहाँ अंधेरे में हनुमान चालीसा और रामायण के स्फुट अंशों का पाठ ही ईश्वर से सीधा संपर्क साधने का साधन बन गया था । महात्मा गांधी जी की प्रेरणा से पंडित बासदेव बिसुनदयाल ने हिन्दी और भारतीय संस्कृति को अपने स्वाधीनता आंदोलन के मूल में रखा और आजादी पाई । क्या यह कथा भारत की आजादी के आंदोलन में हिन्दी की प्रतिष्ठा से मिलती जुलती नहीं दिखाई देती ? लेकिन भारत में हिन्दी को जिस प्रकार का राजनैतिक समर्थन आज की स्थिति में प्राप्त है उसे देखते हुए मेरा मानना तो यह है कि हिन्दी की स्थिति मॉरीशस में भारत से भी अधिक प्रतिष्ठित दिखाई देती है । केवल इसलिए नहीं कि उस छोटे से देश में दो-दो विश्व हिन्दी सम्मेलन हुए, इसलिए नहीं कि हिन्दी को विश्वभाषा बनाने का सपना पूरा करने के लिए विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना वहाँ हुई, इसलिए भी नहीं कि हिन्दी में लगभग 400 ग्रन्थों/रचनाओं का प्रकाशन अकेले मॉरीशस से हो चुका है अपितु इसलिए कि मॉरीशस ही ऐसा देश है जहाँ के राष्ट्रपिता सर शिवसागर रामगुलाम से लेकर राष्ट्रपति सर अनिरुद्ध जगन्नाथ तक बड़े गर्व से हिन्दी बोलते हैं ।
मॉरीशस में न केवल सैकड़ों काव्य और कहानी संकलनों का प्रकाशन हुआ है बल्कि वह एक समृद्ध उपन्यास विधा पर भी गर्व कर सकता है । लगभग हर विधा में रचनाएँ मॉरीशस में हुई हैं । काव्य संग्रहों और कहानी संकलनों के अलावा 56 उपन्यास, 26 नाटक/एकांकी, 3 अनूदित नाटक, 13 निबंध संग्रह, 12 जीवनियाँ, 4 व्यंग्य संग्रह, 3 यात्रावृत्त, 2 बाल रचनाएँ, 8 संस्मरण, लोक साहित्य की 4 रचनाएँ, इतिहास पर 7 रचनाएँ, धर्म, दर्शन और संस्कृति पर 19 रचनाएँ, साहित्य के इतिहास पर 6 रचनाएँ, 4 शोधकार्य और 13 विविध रचनाएँ मॉरीशस में प्रकाशित हुई हैं ।
फीजी
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आरकाटियों (रिक्रूटरर्स) के जाल में फंसकर जब भोले भाले भारतीय वर्ष, 1879 में पहली बार ‘लेवनीदास’ जहाज से गिरमिटिया (एग्रीमेंट का अपभ्रंश रूप) मजदूर बनकर फीजी पहुँचे होंगे तो अपना देश छूटने से ज्यादा चिन्ता उन्हें नए देश में बसने की रही होगी । लेकिन सब कुछ छोड़-छाड़कर भारत से एक अनजान द्वीप की यात्रा पर निकले इन मजदूरों के साथ उनकी संस्कृति और संस्कृति वाहिनी भाषा, मृग की कुण्डली में बसी कस्तूरी के समान साथ थी। वे जा तो रहे थे ब्रिटिश साम्राज्य के एक अनजाने क्षितिज की ओर लेकिन उनकी महारानी उनके साथ थी । हाँ, हाँ उनकी अपनी महारानी जिसे वे रामायण महारानी कहते थे। अपने 132 वर्ष के प्रवास में फीजी के भारतवंशी, अलग अलग अधिपतियों/राष्ट्रपतियों के अधीन काम करते हुए भी अपनी महारानी को ही सर्वोच्च स्थान देते रहे । उनके अपने बीच ही नहीं बल्कि काईबीती (फीजी के मूल निवासी) लोगों के साथ संपर्क की भाषा भी धीरे-धीरे हिन्दी ही बन गई । कहते हैं कि – "स्वधर्मे निधनम् श्रेय: परधर्मे भयावह:" । स्वधर्म (स्व-संस्कृति) को न त्यागने वाले फीजी गिरमिटिया मजदूरों में हिन्दी शिक्षण का व्यवस्थित कार्य शुरू किया- आर्य प्रतिनिधि सभा ने । बाद में श्री सनातन धर्म महासभा ने भी इस काम को आगे बढ़ाया । श्री दिवाकर प्रसाद और श्री भास्कर मिश्र जैसे पत्रकारों ने फीजी रेडियो में हिन्दी को प्रतिष्ठित किया । डॉ. मणिलाल को भारतीय प्रवासियों का दीनबन्धु कहना अनुचित न होगा । उन्होंने न केवल मॉरीशस में बल्कि फीजी में भी पद-दलित प्रवासी भारतीयों को मान और प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्ष किया । गिरमिटिया मजदूरों को संगठित करने के लिए उनके द्वारा अंग्रेजी में पहला समाचार पत्र प्रकाशित हुआ- `द सेटलर' के नाम से वर्ष 1913 में । बाद में पंडित शिवराम शर्मा के संपादन में इसी का हिन्दी संस्करण निकलने लगा । इसे फीजी में हिन्दी का पहला समाचार पत्र कहा जाता है । बाद में फीजी समाचार (बाबू राम सिंह के संपादन में), वैदिक संदेश, शान्तिदूत आदि का प्रकाशन होने लगा । पाक्षिक समाचार पत्र शान्तिदूत को विदेश में हिन्दी पत्रकारिता का सशक्त हस्ताक्षर माना जाता है और यह अब तक प्रकाशित हो रहा है ।
हिन्दी बाल पोथी (कुल छ भागों में) में से पाँच भागों के लेखक पंडित अमीचन्द शर्मा को पहला हिन्दी लेखक कहा जा सकता है । हिन्दी बाल पोथी का प्रकाशन यद्यपि बाद में हुआ और उससे पहले पंडित रामचन्द्र शर्मा की पुस्तक फीजी दिग्दर्शन वर्ष 1936 में प्रकाशित हो चुकी थी । प्रकाशन की कठिनाइयों के कारण फीजी के हिन्दी रचनाकारों की पुस्तकें कम प्रकाशित हो पाई हैं, फिर भी पंडित कमला प्रसाद मिश्र, महावीर मित्र, काशीराम कुमुद, ज्ञानी दास, जोगिन्द्र सिंह कंवल, अनुभवानंद आनंद जैसे कवि और महेन्द्र चन्द्र शर्मा, प्रो. सुब्रमणी, गुरुदयाल शर्मा, भारत बी मौरिस जैसे गद्य लेखक फीजी में हिन्दी के प्रमुख हस्ताक्षर हैं । प्रो सुरेश ऋतुपर्ण ने पंडित कमला प्रसाद मिश्र की काव्य साधना के प्रकाशन के माध्यम से पंडित मिश्र की प्रतिभा को विश्व के सामने रखा । श्री विवेकानन्द शर्मा ने फीजी में हिन्दी को न केवल लेखक के रूप में बल्कि राजनेता के रूप में भी प्रतिष्ठित किया । उनकी कलम कई विधाओं में सक्रिय रही। प्रशान्त की लहरें नामक कहानी संग्रह से लेकर सरल हिन्दी व्याकरण तक और फीजी के प्रधानमंत्री से लेकर फीजी में सनातन धर्म-सौ साल की रचना करके वे फीजी हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर गए हैं ।
सूरीनाम, गयाना, त्रिनीदाद
5 जून, 1873 को लालारुख ने जब सूरीनाम के तट पर लंगर डाला और गिरमिटिया मजदूरों के पहले जत्थे के चरण जब इस धरती पर पड़े तो सच मानिए कि हिन्दी ने पूर्वी गोलार्द्ध से पश्चिमी गोलार्द्ध की अपनी विश्वयात्रा का एक और पड़ाव पार कर दिया था । कुल लगभग 65 जहाजों में धीरे-धीरे करके 34,304 हिन्दुस्तानी इस देश में आए । आप जानते ही होंगे कि 1975 में नीदरलैण्ड से आजादी मिलने के बाद और प्रवासी भारतीयों की एक बड़ी आबादी के नीदरलैण्ड में जाकर बस जाने के बावजूद सूरीनाम में लगभग 40 प्रतिशत आबादी भारतवंशियों की है । कुल लगभग 36 वर्ष के आजाद सूरीनाम में लगभग 134 मंदिर व धार्मिक केन्द्र हैं, जो न केवल धार्मिक-सामाजिक आयोजनों के साक्षी रहते हैं बल्कि भाषायी जरुरतों की पूर्ति का एक बड़ा साधन भी हैं । जिस प्रकार से पं अमीचंद शर्मा ने हिन्दी शिक्षण के लिए बाल पोथी, फीजी में लिखी थी उसी प्रकार से सूरीनाम में व्यवस्थित हिन्दी शिक्षण की शुरुआत का श्रेय बाबू महातम सिंह को दिया जाना चाहिए । आज पचास से अधिक स्वयंसेवी हिन्दी शिक्षक, बाबू महातम सिंह के काम को आगे बढ़ाते हुए लगभग 600 विद्यार्थियों को हिन्दी की शिक्षा दे रहे हैं ।
मुंशी रहमान खान को सूरीनाम का आदि हिन्दी कवि कहा जाता है । उनकी रहमान दोहा शिक्षावली और पंडित रामलाल शर्मा की वेद वन्दना के रूप में हिन्दी काव्य का जो निर्झर उन्नीसवीं शताब्दी में शुरु हुआ था वह आज पंडित लक्ष्मी प्रसाद बलदेव (बग्गा), श्री मंगल प्रसाद, बाबू चंद्रमोहन, रणजीत सिंह, महादेव खुखुन, अमर सिंह रमण, डॉ जीत नराइन, सुरजन परोही, पंडित हरिदेव सहतू, रामनारायण झाव, रामदेव रघुवीर, जनसुरजनराइन सिंह सुभाग, प्रेमानन्द भोंदू के रूप में आगे बढ़कर छोटी नदी का रूप लेने लगा है । इस कार्य में अपनी तरह से सुशीला बलदेव मल्हू, संध्या भग्गू, तेजप्रसाद खेदू, सुशील सुक्खू, देवानंद शिवराज, धीरज कंधई और रामदेव महाबीर भी योगदान करते रहे हैं । इस कार्य में नए हस्ताक्षर भी शामिल हैं जैसे कि अमित अयोध्या, वीना अयोध्या, विकास समोधी, डॉ कारमेन जगलाल, कृष्णा कुमारी भिखारी, संध्या लल्कू, तारावती बद्री, लीलावती कल्लू और सुमित्रादेवी बलदेव । यहाँ की सक्रिय पत्रिकाएँ ही इन लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन का साधन हैं और इनमें सूरीनाम साहित्य मित्र संस्था के तत्वावधान में प्रो पुष्पिता अवस्थी द्वारा स्थापित पत्रिका शब्द शक्ति, सूरीनाम हिन्दी परिषद् की सूरीनाम दर्पण और हिन्दी नामा, आर्य दिवाकर की धर्म प्रकाश और वैदिक संदेश, बाबू महातम सिंह की शान्ति दूत प्रमुख हैं । हाल ही में हिन्दी एवं संस्कृति अताशे सुश्री भावना सक्सेना के संपादन में एक कविता संग्रह ‘एक बाग के फूल’ का प्रकाशन हुआ है । यद्यपि प्रो पुष्पिता के संपादन में सूरीनाम की अन्य भाषाओं की रचनाएँ, हिन्दी में कथा सूरीनाम और कविता सूरीनाम के शीर्षक से वर्ष 2003 में प्रकाशित हो चुकी हैं । हिन्दी की प्राध्यापिका डॉ एन. कान्ता रानी के संपादन में और भारतीय दूतावास के सहयोग से मंजूषा हिन्दी पाठमाला हाल ही में 3 खंडों में प्रकाशित हुई है ।
दक्षिण अमेरिका में अवस्थित तीन पड़ोसी देश गयाना के नाम से जाने जाते हैं- डच गयाना अर्थात् सूरीनाम, ब्रिटिश गयाना अर्थात् गयाना और फ्रेंच गयाना । हमारा तात्पर्य यहाँ केवल ब्रिटिश गयाना से है । सूरीनाम की तरह ही ब्रिटिश गयाना में हिन्दुस्तानी मजदूर शर्तबन्दी प्रथा के अंतर्गत गए थे । पहला जहाज व्हिटवी, 13 जनवरी, 1838 को 249 श्रमिकों के साथ कोलकाता से रवाना हुआ था । 16 दिन बाद 165 श्रमिकों को लेकर चला हेसपरस भी व्हिटवी के साथ ही 5 मई 1838 को डेमरारा में गयाना के तट पर पहुँचे । यद्यपि महात्मा गांधी और दीनबंधु सीएफ एंड्रूज के प्रयत्नों से गयाना में हिन्दी शिक्षा की व्यवस्था, गयाना के आजाद होने से पहले ही हो गई थी लेकिन गयाना में हिन्दी की स्थिति सूरीनाम जैसी नहीं है । बाबू महातम सिंह के सद्प्रयासों से गयाना में हिन्दी का शिक्षण तो शुरु हुआ और श्रीमती रत्नमयी दीक्षित एवं श्री योगीराज जी ने इस कार्य को जी-जान से आगे बढ़ाया लेकिन प्रकाशन संस्थानों एवं खरीदारों के अभाव में कोई उल्लेखनीय पुस्तक यहाँ प्रकाशित न हो पाई । गयाना की स्वयंसेवी संस्थाओं के अलावा, भारतीय उच्चायोग, गयाना विश्वविद्यालय और भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र में भी हिन्दी शिक्षण समय समय पर होता रहा है। गयाना हिन्दी प्रचार सभा, गयाना हिन्दू धार्मिक सभा, महात्मा गांधी संगठन, आदि जैसी संस्थाओं ने इस कार्य को आगे बढ़ाया है ।
त्रिनिदाद एवं टोबैगो की स्थिति भी लगभग गयाना जैसी ही है । लगभग 158 साल पहले से लेकर अब तक इस देश में हिन्दी भाषियों ने हिन्दी के प्रति अपना प्रेम तो प्रदर्शित किया है लेकिन पश्चिमी प्रभाव में यहाँ इन भारतवंशियों की भाषा भी क्रियोल हो गई है । स्पेनी क्रियोल, फ्रेंच क्रियोल ने हिन्दी के कुछ शब्दों को अपनाया अवश्य है, लेकिन मूल भाषा यहाँ गुम होने लगी है । हिन्दी को अब 70 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में बोले जाते देखा जाता है । त्रिनिदाद में हिन्दी शिक्षण के प्रकल्प के साथ-साथ चनका सीताराम की हिन्दी निधि, रवि महाराज का हिन्दू प्रचार केन्द्र और प्रोफेसर एवं महाकवि/संगीतज्ञ हरिशंकर आदेश का भारतीय विद्या संस्थान, हिन्दी भाषा, भारतीय संगीत और लोकगीतों एवं लोककलाओं को संजोने/बढ़ाने का काम कर रहे हैं लेकिन साहित्य सृजन जैसी कोई स्थिति वहाँ नहीं बन पाई है । प्रो हरि शंकर आदेश भी अब कनाडा में रह रहे हैं, नहीं तो उन्होंने अकेले ही शताधिक पुस्तकें हिन्दी भाषा में लिखी हैं । यों तो सनातन धर्म महासभा, आर्य प्रतिनिधि सभा, हिन्दू सेवा संघ की ओर से भी हिन्दी के पठन पाठन की व्यवस्थाएँ होती रही हैं और भारतीय दूतावास एवं वैस्टइंडीज विश्वविद्यालय भी हिन्दी शिक्षण के लिए कटिबद्ध हैं लेकिन त्रिनिदाद रेडियो ने अवश्य ही हिन्दी शिक्षण के लिए समय समय पर ठोस पहल की हैं । स्थानीय एफ एम रेडियो 91.1 पर राजिन महाराज, 90.5 पर हाइदी रामभरोसे, रणधीर महाराज जैसे लोगों ने समय समय पर रेडियो पर हिन्दी सिखाने के कार्यक्रम तैयार किए और प्रसारित किए । प्रो वी आर जगन्नाथन के कार्यकाल में हिन्दी शिक्षण को अवश्य ही एक नई दिशा मिली ।
दक्षिण अफ्रीका
महात्मा गांधी की कर्मभूमि दक्षिण अफ्रीका में हिन्दी की स्थिति पर बहुत चर्चा भारत में नहीं हुई है। मेरा मानना है कि दक्षिण अफ्रीका, भविष्य में गयाना और त्रिनिदाद की अपेक्षा हिन्दी भाषा का एक महत्वपूर्ण स्थान बनकर उभरेगा । हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि व्यापारिक उद्देश्य के लिए हजारों गुजराती उद्यमी अफ्रीका गए और भारत से बाहर व्यापार के माध्यम से अपनी जड़ें जमाने वालों में गुजराती भारतीयों का अग्रणी स्थान है । शर्तबन्दी प्रथा के अंतर्गत भी मॉरीशस, फीजी, गयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद के अलावा दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूर गए थे । वे वर्ष 1860 में वहाँ पहुँचने लगे थे । प्रारंभ में तो अन्य साम्राज्यवादी ताकतों की भांति ही दक्षिण अफ्रीका के शासक गोरों ने हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं की और हिन्दी का पठन पाठन निजी प्रयत्नों तक सीमित रहा लेकिन बाद में भारतवंशियों की प्रगति के लिए बड़े प्रयत्नों से वर्ष 1927 में केपटाउन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए यद्यपि हिन्दी शिक्षण की बात तब भी लागू नहीं हो पाई ।
जिस प्रकार से गयाना और सूरीनाम में बाबू महातम सिंह ने हिन्दी शिक्षण को व्यवस्थित किया और फीजी में पंडित अमीचंद शर्मा ने, उसी प्रकार से वर्ष 1947 में भारत से गए पंडित नरदेव वेदालंकार ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा में अपने हिन्दी शिक्षण के अनुभव को वहाँ लागू किया और हिन्दी पाठ्यक्रम में व्यवस्था एवं शैक्षिक मूल्यों की स्थापना की । अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों की हिन्दी की पढ़ाई के लिए और उन्हें भारतीयता से जोड़े रखने के लिए एक अन्य विभूति को भी हमें नहीं भूलना चाहिए, वे हैं स्वामी भवानीदयाल सन्यासी । हिन्दी की शिक्षा के मामले में एक नया मोड़ तब आया जब 1961 में डरबन वेस्टविल विश्वविद्यालय में बी ए से लेकर पीएच.डी तक हिन्दी पढ़ाई जाने लगी । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करके प्रो रामभजन सीताराम ने यहाँ हिन्दी की पढ़ाई को उच्च स्तर का बनाया । हालांकि 1977 में सरकारी स्कूलों में हिन्दी का प्रवेश हो गया लेकिन व्यावसायिक कारणों से और देशीय भाषाओं को बढ़ावा देने की नीति लागू होने से अब वहाँ सरकारी तौर पर हिन्दी को समर्थन मिलना बहुत कठिन है लेकिन प्रौद्योगिकी ने उम्मीद बंधाई है और हिन्दी अब फिर से भारतवंशियों की जुबान पर आने लगी है । हिन्दी शिक्षा संघ ने दक्षिण अफ्रीका में हिन्दी के लिए जो कार्य किया है उसकी बराबरी विश्व में कुछ गिनी-चुनी हिन्दी संस्थाएँ ही कर सकती हैं । हिन्दी शिक्षा संघ की स्थापना 25 अप्रैल, 1948 को हुई और तुरंत ही 35 नई पाठशालाओं ने इसके अधीन हिन्दी सिखाना शुरू कर दिया । एक कदम आगे बढ़ते हुए हिन्दी शिक्षा संघ ने वर्ष 1998 में हिन्दवाणी के नाम से अपना रेडियो स्टेशन शुरू किया । विश्व में कार्यरत किसी भी हिन्दी सेवी संस्था का संभवत: यह पहला रेडियो स्टेशन है । इस रेडियो को अब डरबन के अलावा पीटरमेरित्जबर्ग सहित अनेक छोटे छोटे नगरों में भी सुना जाता है । भारतीय दूरदर्शन चैनलों के विश्वव्यापी प्रसारण ने भारतीय संस्कृति, वेश भूषा, खान-पान आदि के बारे में नई समझ पैदा की है । भारत के साथ अफ्रीका के बढ़ रहे आर्थिक-राजनैतिक संबंधों को देखते हुए अफ्रीका में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है । ाभा
नव प्रवास के देश
अमेरिका
जिस प्रकार से पुरा प्रवास के देशों में अधिकांश भारतीय, शर्तबन्दी प्रथा के अन्तर्गत मजदूरों के रूप में गए थे और उन्होंने जी तोड़ मेहनत करके न केवल अपने लिए मान-सम्मान अर्जित किया बल्कि आने वाली पीढि़यों को भी एक ठोस आधार प्रदान किया, उसी प्रकार से नव प्रवास भी कहीं न कहीं शर्तों से जुड़ा रहा है । विश्व के नव धनाढ्य देश यह तो चाहते रहे कि मेहनत मजदूरी के लिए उन्हें दुनियाभर से लोग मिल जाएँ लेकिन उनके कल्याण के लिए किसी ने भी नहीं सोचा । यही नहीं, उनके जीवन को नियंत्रित किया गया, उनकी परम्पराओं, लोक-रीतियों, वेश-भूषा को हीन भावना से देखा गया और जब चाहा तब उनके आगमन पर भी प्रतिबंध लगाए गए । अमेरिकी महाद्वीप में भारतीयों का प्रवेश, किसी भी प्रकार से निर्बाध और सुगम नहीं रहा । कनाडा में उतरे जहाज कोमागाटामारू की कहानी से कौन परिचित नहीं है । यह उस समय की रंगभेदी और नस्लभेदी नीतियों का ज्वलंत उदाहरण है । फिर भी, उन्नीसवीं शताब्दी में जो कुछ लोग अमेरिका, कनाडा में पहुँचे, उन्होंने स्वयं को स्थापित कर लिया और वहीं से उनकी समृद्धि की तथा संभावित अवसरों की कहानियां पंजाब के गाँव गाँव पहुँचने लगीं । वर्ष 1910 तक लगभग 10 हजार भारतीय अमेरिका/कनाडा में पहुँच चुके थे जिनमें लगभग 90 प्रतिशत पंजाबी मूल थे । लेकिन भारतीयों के अमेरिका प्रवेश पर प्रतिबंध कई प्रकार से बने रहे । 1950 और 1960 के दशक में प्रतिवर्ष केवल सौ भारतीय ही कानूनन अमेरिका में आ सकते थे ।
द्वितीय विश्व युद्ध के जो भी परिणाम रहे हों, लेकिन इस युद्ध ने अमेरिका की आँखें खोल दीं और अमेरिका से बाहर की दुनिया को जानने की आवश्यकता उसे महसूस हुई । यह आवश्यकता, विश्व के अन्य देशों की संस्कृति या भाषाओं को जानने समझने की उतनी नहीं थी जितनी कि अपनी आर्थिक एवं प्रतिरक्षा आवश्यकताओं से संचालित एक जरूरत, गंभीरता से महसूस करने की थी । यही कारण है कि आज भी अमेरिका में विदेशी भाषाओं का अध्ययन इन्हीं दो कसौटियों के अनुसार घटता बढ़ता रहता है और इन्हीं दोनों आवश्यकताओं के वशीभूत भारतीयों के आगमन पर प्रतिबंधों में ढील/छूट दी गई और नई नई श्रेणियों में भारतीयों को वहाँ आकर पढ़ने, काम करने और बसने के लिए आमंत्रित भी किया गया । आज विश्वभर में सबसे अधिक प्रवासी भारतीय अमेरिका/कनाडा में ही हैं । उनकी संख्या 25 लाख से भी अधिक है । इनमें पूर्वी अफ्रीका के देशों से वहाँ की राष्ट्रवादी सरकारों द्वारा 1960 के दशक में खदेड़े गए गुजराती व्यापारी भी हैं जिन्होंने अपनी व्यावसायिक बुद्धि का लोहा तंजानिया, केन्या, उगांडा के अलावा अमेरिका में भी मनवा लिया ।
अमेरिका की इन्हीं जरूरतों ने और 11 सितम्बर, 2001 की भयावह घटनाओं की पृष्ठभूमि में उसे एशियाई भाषाओं की ओर विशेष ध्यान देने के लिए प्रेरित किया । अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने एक कदम आगे बढ़ते हुए जनवरी 2006 में अरबी, उर्दू, पश्तो आदि भाषाओं के साथ हिन्दी को विशेष प्रोत्साहन देने की घोषणा की । अमेरिका में यद्यपि हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं का आधार तैयार करने का काम लाला हरदयाल जी ने वर्ष 1913 में ही कर दिया था, लेकिन अपनी भाषा सहित अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकार, प्रवासी भारतीयों को, संविधान सम्मत रूप में मिलने का काम शुरू हुआ वर्ष 1946 से । वर्ष 1947 में यूनिवर्सिटी ऑव पेन्सिलवेनिया में दक्षिण एशियाई विभाग खोला गया जिसमें हिन्दी की पढ़ाई की भी व्यवस्था थी इसमें पादरी नारमन ब्राउन का योगदान भुलाया नहीं जा सकता । उन्नीसवीं शताब्दी के छठे दशक में प्रमुख विश्वविद्यालयों- शिकागो, मैडिसन, पेन, कोलंबिया, बर्कले आदि में, आठवें दशक में कुछ अन्य विश्वविद्यालयों के साथ प्रतिरक्षा संस्थान में और नवें दशक से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक तक 100 से अधिक विश्वविद्यालयों/उच्च शिक्षा संस्थानों और भाषा संस्थानों में हिन्दी की पढ़ाई की व्यवस्था हो गई । स्वैच्छिक संस्थाओं जैसे कि हिन्दी यूएसए के बैनर तले संडे स्कूलों में भी हिन्दी की पढ़ाई आज अमेरिका में हो रही है ।
स्वर्गीय कुंअर चन्द्र प्रकाश सिंह की प्रेरणा से 18 अक्टूबर, 1980 को अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की स्थापना हुई । हिन्दी शिक्षण के अलावा अन्य आयोजनों, कवि सम्मेलनों, पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में इस संस्था ने एक नए युग का सूत्रपात किया । स्वर्गीय रामेश्वर अशांत ने वर्ष 1989 में विश्व हिन्दी समिति की स्थापना की और विश्वा नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया और इसके बाद सौरभ त्रैमासिक पत्रिका भी निकाली । डॉ राम चौधरी की अध्यक्षता में विश्व हिन्दी न्यास की स्थापना के बाद उसका त्रैमासिक प्रकाशन हिन्दी जगत के नाम से निकलता है और पूरी दुनिया में पढ़ा जाता है । इसी कड़ी में श्री श्याम त्रिपाठी के नेतृत्व में हिन्दी चेतना पत्रिका कनाडा से प्रकाशित की जा रही है और वर्तमान में इसका संपादन श्रीमती सुधा ओम धींगरा कर रही हैं । विश्व हिन्दी न्यास की त्रैमासिक विज्ञान प्रकाश और बाल जगत तथा डॉ वेद प्रकाश वटुक की अन्यथा पत्रिका भी प्रकाशित हो रही हैं । निश्शुल्क हिन्दी साप्ताहिक नमस्ते यूएसए का प्रकाशन सनीवेल हिन्दू मंदिर ने प्रारंभ किया है और इसका वितरण हजारों की संख्या में हो रहा है ।
परिमाण और प्रसार की दृष्टि से देखें तो नव प्रवास के देशों में अमेरिका में प्रवासी हिन्दी लेखन की परंपरा बहुत पुष्ट है । मॉरीशस को छोड़कर, भारत से बाहर इतना साहित्य सृजन और प्रकाशन कहीं भी नहीं हो रहा है । गीतकार इंदुकान्त शुक्ल से लेकर सुस्थापित कवि श्री गुलाब खंडेलवाल, डॉ विजयकुमार मेहता, श्री ओम प्रकाश गौड़ प्रवासी, रामेश्वर अशांत, डॉ वेद प्रकाश वटुक तक और नई शृंखला में सुधा ओम धींगरा, हिमांशु पाठक, धनंजय कुमार, राकेश खंडेलवाल, सुरेन्द्र कुमार तिवारी, अनंत कौर, अंजना संधीर और नरेन्द्र सेठी ने अपने लिए प्रवासी हिन्दी कवियों में जगह बनाई है। कथा साहित्य में स्वर्गीय सोमा वीरा, उषा प्रियंवदा, सुषम बेदी, उमेश अग्निहोत्री ने विश्व हिन्दी प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया है । लेखक के पास उपलब्ध सूचना के अनुसार अमेरिका में अब तक 132 काव्य संग्रहों और 52 कहानी संकलनों के अलावा 28 उपन्यास, 13 नाटक/एकांकी, 5 लेख संग्रह, इतिहास एवं विविध विषयों पर 13 पुस्तकें, 4 संस्मरण/यात्रावृत्त प्रकाशित हुए हैं ।
इसी के साथ कनाडा में श्रीमती मधु वार्ष्णेय, श्री नरेन्द्र भागी, आचार्य शिव शंकर द्विवेदी, राज शर्मा, श्री श्याम त्रिपाठी, श्री श्रीनाथ द्विवेदी, श्री समीर लाल, जसवीर कलरवी, डॉ भूपेन्द्र सिंह, श्री हरदेव सोढी, श्री ललित अहलूवालिया, श्री भुवनेश्वरी पांडेय, श्री अमर सिंह जैन और श्री कृष्ण कुमार सैनी ने लगभग 72 पुस्तकें प्रकाशित कराई हैं, जिनमें काव्य संग्रह, कहानी संकलन, उपन्यास, व्यंग्य संग्रह, संस्मरण आदि शामिल हैं ।
ब्रिटेन
नव प्रवास के देशों में भारत के लिए अमेरिका और ब्रिटेन का स्थान विशिष्ट है । अमेरिका में हिन्दी लेखन के बारे में चर्चा करते हुए इसी लेख में अन्यत्र यह उल्लेख किया गया है कि प्रवासी हिन्दी लेखन में ब्रिटेन का स्थान अद्वितीय है । राजनैतिक रूप से भी, शासक और शासित के बीच बहुत अच्छे संबंधों के दो मजबूत उदाहरण हैं- अमेरिका और ब्रिटेन तथा ब्रिटेन और भारत के संबंध । विश्व की सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था-अमेरिका, लोकतंत्र और मैग्नाकार्टा की मातृभूमि-ब्रिटेन और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र- भारत के बीच गहराते संबंध मात्र संयोग नहीं हैं। इसमें प्रवासी भारतीयों के उस विशाल परिवार की अपनी गहरी भूमिका है जिसके सदस्यों की संख्या इन देशों में क्रमश: 25 लाख और 16 लाख है । ब्रिटेन में प्रवासी भारतीयों ने न केवल सामाजिक क्षेत्र में अपितु आर्थिक क्षेत्र में भी अपनी साख बनाई है और औसत भारतीय का योगदान, यहाँ की अर्थव्यवस्था में, सामान्य से दुगुना है । उदारीकरण के बाद भारत की आर्थिक शक्ति में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है और इसी के साथ भारत को एक नई दृष्टि से देखा जाने लगा है । ब्रिटेन के साथ भारत के आर्थिक, सैन्य, राजनयिक, व्यापारिक संबंधों में एक नई चेतना आई है और भारत के लोगों, भारत की संस्कृति, भारत की भाषाओं, यहाँ तक कि भारत के भोजन के बारे में भी ब्रिटिश समाज की रुचि बढ़ी है। मैं यह मानता हूँ कि विश्व में किसी भी प्रकार के व्यापार की तुलना में भाषा का और भाषा-आधारित उत्पादों का व्यापार सबसे बड़ा है । उत्पाद की स्वीकार्यता से पहले भाषा की स्वीकार्यता का अपना महत्व है और यह भी सत्य है कि व्यापारिक संबंध हमेशा एकतरफा नहीं रह सकते । यदि अंग्रेजी के प्रसार से भारत में अंग्रेजी-भाषी देशों को व्यापार में सुविधा होती है तो भारतीय भाषाओं को जानने से उन्हें गहरी पैठ मिलती है । वे गाँव गाँव जा कर कह सकते हैं- ये दिल माँगे मोर, फिर भी – रिन की चमकार, बार बार लगातार का मुकाबला मोर नहीं कर सकता ।
अस्तु, ब्रिटेन में हिन्दी लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से हुई । आज से लगभग 128 वर्ष पहले वर्ष 1883 में कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह के संपादन में पहला हिन्दी अंग्रेजी त्रैमासिक समाचार पत्र हिन्दोस्थान प्रकाशित हुआ । हालांकि आगे चलकर 1884 में इंग्लैण्ड में यह केवल अंग्रेजी में निकलने लगा लेकिन भारत में 1885 से हिन्दी में प्रकाशित होने लगा । इसके बाद हिन्दी प्रचार परिषद, लन्दन के तत्वावधान में वर्ष 1964 में प्रवासिनी त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन होने लगा । इसका प्रकाशन ज्योति प्रिंटर, 40, स्टार स्ट्रीट, लन्दन से होता था और इसका कार्यालय था- 15, क्रॉच हॉल रोड, लन्दन एन 8 पर। इसके संपादक थे श्री धर्मेन्द्र गौतम और पत्रिका में श्री राधेश्याम सोनी, श्री जगदीश मित्र कौशल, श्री बैरागी, श्री मोहन गुप्त, श्री विनोद पांडे, श्री सत्यदेव प्रिंजा, अबू अब्राहम, कान्ता पटेल आदि का लेखकीय सहयोग होता था ।
इसके बाद जून, 1964 में श्री रमेश कुमार सोनी ने मिलाप वीकली पत्र का संपादन और प्रकाशन प्रारंभ किया तथा वर्ष 1966 से इसमें हिन्दी के भी दो पृष्ठ दिए जाने लगे । आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आठ पृष्ठों का यह साप्ताहिक समाचार पत्र अब भी प्रकाशित होता है और इस प्रकार ब्रिटेन में इसे उर्दू-हिन्दी का सर्वाधिक दीर्घ अवधि तक प्रकाशित होने वाला अखबार कहना उचित ही होगा । श्री जगदीश मित्र कौशल के संपादन में 23 मार्च, 1971 को लन्दन से ही अमरदीप साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ हुआ और लगभग 32 वर्ष तक प्रकाशन के बाद यह वर्ष 2003 में बन्द हो गया । अमरदीप साप्ताहिक के महत्व को देखते हुए श्री जगदीश मित्र कौशल को भारतीय उच्चायोग की ओर से पहला आचार्य महावीर प्रसार द्विवेदी हिन्दी पत्रकारिता सम्मान वर्ष 2006 के लिए दिया गया । पत्रिका चेतक का प्रकाशन भी श्री नरेश भारतीय के संपादन में कुछ समय के लिए हुआ । तत्पश्चात् वर्ष 1997 में त्रैमासिक पत्रिका पुरवाई का प्रकाशन, डॉ पदमेश गुप्त के संपादन में शुरू हुआ जो अभी तक जारी है । हिन्दी के लिए पूर्णत: समर्पित इस पत्रिका ने ब्रिटेन के हिन्दी रचनाकारों को एक मंच दिया । इस बीच, भारतीय उच्चायोग की छमाही पत्रिका भारत भवन का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो रुक-रुककर जारी है । श्रीमती शैल अग्रवाल ने लेखनी नामक एक मासिक वैब पत्रिका का प्रकाशन भी वर्ष 2008 से प्रारंभ किया है ।
साहित्यिक रचनाओं में पहली प्रकाशित रचना डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव की है – मिसेज जोन्स और उनकी वह गली । यह एक लंबी कविता है । इसके बाद डॉ निखिल कौशिक का काव्य संकलन- तुम लन्दन आना चाहते हो, वर्ष 1987 में प्रकाशित हुआ । सच तो यह है कि ब्रिटेन के प्रवासी रचनाकारों का कुल इतिहास लगभग 30 वर्ष का है जिसमें कि उनकी रचनाएँ पुस्तकाकार प्रकाशित हुई हैं । प्रकाशन की गति से देखें तो ब्रिटेन में हिन्दी साहित्य का भविष्य काफी उज्ज्वल दिखाई देता है । अभी तक ब्रिटेन में कुल 106 काव्य संग्रह, 12 उपन्यास, 06 नाटक/एकांकी, 06 निबंध/जीवनियाँ, 07 यात्रावृत्त/संस्मरण, 36 कहानी संग्रह, इतिहास/धर्म/दर्शन पर 05 ग्रन्थ, शोध/हिन्दी शिक्षण/विविध ग्रन्थों के रूप में कुल 25 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है ।
ब्रिटेन के प्रमुख रचनाकारों में शामिल हैं- डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव, श्री प्राण शर्मा, श्रीमती उषा राजे सक्सेना, डॉ कृष्ण कुमार, श्री तेजिन्दर शर्मा, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ निखिल कौशिक, श्री मोहन राणा, श्रीमती दिव्या माथुर, (स्वर्गीय) डॉ गौतम सचदेव, डॉ पद्मेश गुप्त, श्री महेन्द्र दवेसर दीपक, श्री रमेश पटेल, श्रीमती शैल अग्रवाल, श्री भारतेन्दु विमल, श्रीमती उषा वर्मा, श्रीमती कादम्बरी मेहरा, श्रीमती पुष्पा भार्गव, श्रीमती विद्या मायर, श्रीमती कीर्ति चौधरी, श्रीमती प्रियम्वदा मिश्रा, श्रीमती अरुणा सभरवाल, श्रीमती श्यामा कुमार, डॉ इन्दिरा आनंद, श्री वेद मित्र मोहला, श्रीमती नीना पॉल, श्री नरेश अरोड़ा, श्रीमती अचला शर्मा, श्रीमती चंचल जैन, श्रीमती स्वर्ण तलवाड़, डॉ कृष्ण कन्हैया, श्रीमती जय वर्मा, श्री धर्मपाल शर्मा, श्री सुरेन्द्र नाथ लाल, श्री रमेश वैश्य मुरादाबादी, श्री सोहन राही, श्रीमती रमा जोशी, डॉ श्रीपति उपाध्याय, श्री एस पी गुप्ता, श्री जगभूषण खरबन्दा, श्री यश गुप्ता, श्री जे एस नागरा, श्री मंगत भारद्वाज, श्री जगदीश मित्र, श्री रिफत शमीम, श्री इस्माइल चुनारा, श्रीमती तोषी अमृता, श्रीमती राज मोदगिल, श्रीमती उर्मिल भारद्वाज, श्रीमती निर्मल परींजा आदि ।
नव प्रवास के अन्य देश हैं- न्यूजीलैण्ड, आस्ट्रेलिया, नार्वे, डेनमार्क, सउदी अरब, शरजाह, डेनमार्क, जापान आदि देश । यूरोप के कई अन्य देशों में भी प्रवासी भारतीय अल्प संख्या में हैं और हिन्दी लेखन भी कर रहे हैं परन्तु उनका उल्लेख स्थानाभाव के कारण इस लेख में नहीं किया जा रहा है ।
निष्कर्षत: यह निर्विवाद सत्य है कि भारत से बाहर सबसे अधिक मात्रा और संभवत: सबसे अधिक गुणवत्ता वाला लेखन मॉरीशस में ही हुआ है और हो रहा है । ऐसा कहते हुए मेरे मन में अमेरिका के प्रवासी/निवासी रचनाकारों के विपुल साहित्य सृजन की उपेक्षा का भाव बिल्कुल नहीं है और न ही ब्रिटेन में हिन्दी साहित्य सृजन के विकासशील लेकिन सशक्त बिरवे को दृष्टि से ओझल करने का ही भाव है । जब भी हम मॉरीशस और ब्रिटेन में हिन्दी साहित्य की बात करें तो इन दोनों देशों के भौगोलिक क्षेत्रफल के सापेक्ष अमेरिका के क्षेत्रफल और वहाँ प्रवासी भारतीयों के संख्याबल को भी ध्यान में रखना होगा । इसी अर्थ में मैंने कहा है कि हिन्दी में सर्वाधिक साहित्य सृजन मॉरीशस में हो रहा है। इस दृष्टि से देखें तो ब्रिटेन में हिन्दी साहित्य सृजन का महत्व अपने आप सामने आ जाएगा ।
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संदर्भ ग्रन्थ सूची
1. विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता, डॉ पवन कुमार जैन, 1993 ।
2. चेतना का आत्मसंघर्ष- हिन्दी की इक्कीसवीं सदी, संपादक- श्री कन्हैयालाल नन्दन, 2007।
3. विश्व हिन्दी रचना, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, 2003 ।
4. स्मारिका, सातवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन, सूरीनाम, 2003 ।
5. विश्व हिन्दी पत्रिका, विश्व हिन्दी सचिवालय, 2009 ।
6. प्रवासी संसार, संपादक श्री राकेश पांडेय, विश्व हिन्दी सम्मेलन विशेषांक, 2007 ।
7. विश्व हिन्दी पत्रिका, विश्व हिन्दी सचिवालय, 2010 ।
8. ब्रिटेन में हिन्दी, श्रीमती उषा राजे सक्सेना, 2005 ।
9. प्रवासी भारतीयों की हिन्दी सेवा, श्रीमती कैलाश कुमारी सहाय ।
10. हिन्दी की विश्व यात्रा, प्रो सुरेश ऋतुपर्ण, 2005 ।
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शुक्रवार, 22 जून 2012
फ़िजी में हिन्दी : एक वर्ष का लेखाजोखा
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
पर
9:52 am
लेबल:
विश्वम्भरा,
Fiji,
Hindi,
Hindi : as an international language,
Hindi in Fiji
भारत का उच्चायोग
सूवा
वार्षिक प्रगति रिपोर्ट -2011 - 2012
फीजी में हिंदी दिवस समारोह – 2011
संसार भर में बसे भारतवंशियों के देशों में संभवत: फीजी ही एकमात्र राष्ट्र है जहाँ हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति आज भी खूब फल – फूल रही है। इसका प्रमाण है वर्ष 2011, के सितम्बर माह में समूचे राष्ट्र में हर्ष और उल्लास के साथ आयोजित किया गया हिंदी दिवस समारोह । इस संबंध में प्रस्तुत है एक रिपोर्ट :--
1. भारतीय उच्चायोग और साउथ पैसिफिक यूनिवर्सिटी :-
भारतीय उच्चायोग द्वारा साउथ पैसिफिक यूनिवर्सिटी के सहयोग से ता. 14/09/11 को दो श्रेणियों में , (प्राइमरी एवं सैकिंडरी ) , भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । प्राइमरी एवं सैकिंडरी दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों ने हिंदी भाषी और अहिंदी भाषी उप-श्रेणियों में “ “मीडिया एवं बच्चे" , “अध्ययन का आनंद", “रामायण न होती तो हमारी संस्कृति कहाँ होती", “नैतिक शिक्षा का महत्व", “संसार एक परिवार है”, “भाषा द्वारा ही संस्कृति का ज्ञान संवभ है”, “रिश्तों की संजीवनी में बुजुर्गो की भूमिका”, “चिंता नहीं चिंतन कीजिए”, “बदलते परिवेश में नारी की भूमिका”, “प्राकृतिक सोंदर्य और मनुष्य में बढता हुआ फासला”, आदि बहुआयामी विषयों पर भाषण प्रस्तुत किए । इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त श्री विनोद कुमार जी ने मुख्य मेहमान के रुप में बच्चों के ओजपूर्ण और गरिमामय भाषणों का भरपूर आनंद लिया यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फीजी मूल के अहिंदी भाषी बच्चों दारा प्रस्तुत भाषण आकर्षण का केंद्र रहा । इस अवसर पर साउथ पैसिफिक यूनिर्विसिटी की हिंदी विभागाध्यक्ष श्रीमती इंदु चंद्रा एवं उनके साथी शेलेश ने आयोजन में महम भूमिका अदा की। श्री रामवीर प्रसाद द्वितीय सचिव (हिंदी) ने दो अन्य योग्य व्यक्तियों के साथ मुख्य निर्णायक की भूमिका निभाई । दोनों श्रेणियों में प्रथम , दितीय , तृतीय पुरुस्कार के रुप में नकद राशि के साथ – साथ विदेश मंत्रालय , हिंदी अनुभाग से प्राप्त उपयोगी हिंदी की पुस्तकें महामहिम श्री विनोद कुमार द्वारा विजेता प्रतिभागियों को भेंट की गई । इस अवसर पर अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने समारोह में हिस्सा लिया तथा लगभग 200 बच्चों की तालियों से सभागार गुंजायमान होता रहा । इस अवसर पर बोलते हुए उच्चायुक्त श्री विनोद कुमार जी ने हिंदी भाषा के महत्व और इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए मिशन की प्रतिबध्द्ता दोहराई और बच्चों के साहसी प्रयास के लिए उन्हें बधाई दी । उन्होने संतोष व्यक्त किया कि फीजी में मात्र भाषा के प्रति सजगता और अनुराग अभी भी मौजूद है । भविष्य में भी ऐसे प्रयासों के लिए मिशन के सहयोग का आश्वासन दिया | रामवीर प्रसाद, दितीय सचिव हिंदी ने विजेता प्रतिभागियों के ओज, भाषण कला, भाषा विन्यास और भाषा की शैलीगत विशेषताओं का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया । श्रीमती इंदु चंद्र ने धन्यवाद ज्ञापन कर समारोह समाप्ति की घोषण की।
शनिवार, 16 जून 2012
दक्षिण चीन में स्थापित होगी हिन्दी पीठ
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
पर
1:51 pm
लेबल:
Hindi,
Hindi : as an international language,
Hindi Chair in China,
Hindi in China
बीजिंग, जून 11
चीन में हिन्दी उन चंद विदेशी भाषाओं में शामिल है जिनकी लोकप्रियता बढ़ रही है। हिन्दी का प्रवेश अब दक्षिणी चीन में होने जा रहा है क्योंकि गुआंगझोउ विश्वविद्यालय में भारत की राष्ट्रभाषा सिखाने के लिए एक पीठ कायम की जायेगी।
गुआंगझोउ विश्वविद्यालय विदेशी अध्ययन विभाग और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद आईसीसीआर) के बीच इस पीठ को स्थापित करने के लिए आज सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये गये। आईसीसीआर दक्षिणी चीन में यह पहली हिन्दी पीठ स्थापित करेगा।
पीकिंग विश्वविद्यालय, बीजिंग विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय सहित विभिन्न चीनी विश्वविद्यालय एवं चीन के विभिन्न हिस्सों में स्थित कई कालेजों में हिन्दी का अध्ययन कराया जाता है।
व्याख्याताओं का कहना है कि चीन में यह भाषा लोकप्रिय हो रही है। कुछ लोग इसे करिअर से जोड़ते हैं। इसके भारत और चीन के बीच बढ़ता आपसी व्यापार है जो पिछले साल 74 अरब डालर पहुँच गया था और इस साल 2015 तक 100 अरब डालर पहुँचने की संभावना है।
गुआंगझोउ विश्वविद्यालय विदेशी अध्ययन विभाग और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद आईसीसीआर) के बीच इस पीठ को स्थापित करने के लिए आज सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये गये। आईसीसीआर दक्षिणी चीन में यह पहली हिन्दी पीठ स्थापित करेगा।
पीकिंग विश्वविद्यालय, बीजिंग विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय सहित विभिन्न चीनी विश्वविद्यालय एवं चीन के विभिन्न हिस्सों में स्थित कई कालेजों में हिन्दी का अध्ययन कराया जाता है।
व्याख्याताओं का कहना है कि चीन में यह भाषा लोकप्रिय हो रही है। कुछ लोग इसे करिअर से जोड़ते हैं। इसके भारत और चीन के बीच बढ़ता आपसी व्यापार है जो पिछले साल 74 अरब डालर पहुँच गया था और इस साल 2015 तक 100 अरब डालर पहुँचने की संभावना है।
भारतीय दूतावास यहाँ हर साल हिन्दी दिवस आयोजित करता है जिसमें चीन भर के हिन्दी प्रशंसक बड़ी संख्या में जुटते हैं। इसके अलावा प्रवासी भारतीयों ने बीजिंग में रविवार विद्यालय गुरुकुल नाम से खोला है जिसमें हिन्दी और भारतीय संस्कृति सिखायी जाती है। लता अय्यर के नेतृत्व में चलाये जाने वाले स्कूल में प्रिया सुंदरराजन, मनीषा भाखड़े, कृष्णा दासगुप्ता और दीपा तुलसीदास शामिल हैं।
भारतीय दूतावास द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार आज सहमति पत्र पर गुआंगझोउ में भारतीय वाणिज्य महादूत इंद्रा मणि पांडेय और गुआंगझोउ विश्वविद्यालय विदेशी अध्ययन के अध्यक्ष झोंग वेइहे ने हस्ताक्षर किये।
आईसीसीआर इससे पहले चीन में हिन्दी और भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए पांच पीठ स्थापित कर चुका है। तीन पीठ जिनान विश्वविद्यालय, शेनझेन विश्वविद्यालय एवं युनान विश्वविद्यालय में विभिन्न क्षेत्र के अध्ययन के लिए स्थापित की गयी हैं।
शुक्रवार, 18 मई 2012
अमेरिका में हिन्दी शिक्षण की लहर : कितना आगे कितना पीछे
प्रस्तुतकर्ता
Kavita Vachaknavee
पर
6:34 pm
लेबल:
Hindi,
Hindi : as an international language,
Hindi in America,
Hindi in USA
अमेरिका में हिन्दी शिक्षण की लहर
कितना आगे कितना पीछे
कितना आगे कितना पीछे
अमेरिका में हिन्दी-शिक्षण में एक नई लहर आई है। 6 फ़रवरी 2006 को अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश ने नेशनल सिक्योरिटी लैंगवेज इनिशियेटिव नाम की एक भाषा-नीति की घोषणा की थी। इस नई नीति के तहत सरकारी विद्यालयों के विदेशी भाषा शिक्षण कार्यक्रम में दस नई भाषाएँ क्रमशः जोड़ने के लिए सरकारी समर्थन देने के लिए सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट की है। इन भाषाओं में हिन्दी भी एक है। अन्य भाषाएँ थीं – चीनी, अरबी, उर्दू, फ़ारसी, तुर्की, पुर्तगाली, स्वाहिली, रूसी और दरी। स्टारटॉक के नाम से यह कार्यक्रम 2007 में चीनी और अरबी से शुरू हुआ। 2008 में हिन्दी, उर्दू और फ़ारसी जोड़ी गईं। 2009 में तुर्की और स्वाहिली जुड़ीं और फिर दो साल बाद दरी और रूसी को भी इस सूची में सम्मिलित कर लिया गया। स्टारटॉक का विस्तार बहुत प्रभावशाली रहा है। 2007 में चीनी और अरबी के 34 कार्यक्रम संपन्न हुए। 2008 में तीन भाषाएँ और जुड़ने के बाद यह संख्या 81 जा पहुँची और फिर अन्य भाषाओं के समावेश के साथ कार्यक्रमों की यह संख्या क्रमशः 116, 134 से गुज़रती हुई 2011 में 156 तक आ पहुँची है । संख्या के साथ साथ यह भी बहुत प्रभावशाली तथ्य है कि अमेरिका के 50 प्रदेशों में से 46 प्रदेशों में स्टारटॉक के कार्यक्रम संपन्न हुए हैं। स्टारटॉक में हिन्दी की स्थिति में भी हर वर्ष प्रगति हुई है। इसके आंकड़े आगे प्रस्तुत किए जाएंगे। इनमें हिन्दी, चीनी और पुर्तगाली भारत, चीन ओर ब्राज़ील की सुधरती हुई आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर सम्मिलित की गई हैं और अन्य भाषाएँ अन्य कारणों के साथ साथ विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से जोड़ी गईं। आर्थिक दृष्टि से उभरते देशों से निकट भविष्य में व्यापारिक संबंधों को मज़बूत करने के लिए वहां की भाषा और संस्कृति के जानकार अगली पीढ़ी में तैयार करने की यह दूरदृष्टि है।
अमेरिका में आजकल हिन्दी जानने का महत्व धीरे धीरे बढ़ रहा है। इसका श्रेय जहाँ एक तरफ़ भारत मूल की उन अनेक संस्थाओं को है जो भारतीय मूल के युवा-वर्ग के लिए बड़े नियमित ढंग से हिन्दी के स्कूल अलग अलग प्रदेशों में चला रही हैं वहाँ अमरीकी सरकार को भी इसका श्रेय जाता है जिसने अपनी भाषा-नीति को स्पष्ट करते हुए हिन्दी को सरकारी स्कूलों के विदेशी-भाषा कार्यक्रम में एक विकल्प के रूप में रखने की घोषणा की है। ग़ैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाएँ भाषा के साथ साथ भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों का ज्ञान बच्चों को देती हैं। सरकारी तंत्र के तहत चलने वाले हिन्दी कार्यक्रमों में भाषा के साथ उसकी अभिन्न सहचरी संस्कृति के भौतिक और वैचारिक पक्षों को समझने-समझाने की अनिवार्यता पर भी बल है। भाषा-संबंधी शोध पर आधारित इस सरकारी सोच का दृढ़ मत है कि भाषा और संस्कृति में अटूट संबंध है और भाषा को समझने और उसका सटीक प्रयोग करने के लिए उससे जुड़ी सांस्कृतिक मान्यताओं का ज्ञान महत्वपूर्ण है। उसी प्रकार स्थानीय संस्कृति को समझने के लिए भी स्थानीय भाषा ही सशक्त माध्यम है। इस प्रकार भाषा और संस्कृति में अन्योन्याश्रित संबंध होने के कारण एक का अस्तित्व दूसरे के बिना अकल्पनीय है।
अमेरिकन सरकार की इस नई नीति को कार्यान्वित करने के लिए 2007 में एक नए राष्ट्रीय कार्यक्रम की घोषणा हुई। राष्ट्रीय स्तर का यह नया कार्यक्रम स्टारटॉक वाशिंगटन डी सी के पास स्थित नेशनल फ़ॉरन लैंगवेज सैंटर का हिस्सा बना। स्टारटॉक के माध्यम से सरकार से प्राप्त आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। ग्रीष्मकालीन सत्र (मई से अगस्त) के दौरान उपर्युक्त भाषाओं में युवा-वर्ग के लिए आयोजित इन भाषा-कार्यक्रमों को भरपूर सहायता मुहय्या की जाती है। इन भाषा-कार्यक्रमों में समाज के सभी वर्गों के युवाओं का स्वागत होता है परंतु कुछ भाषाओं में हेरिटेज शिक्षार्थियों की संख्या अधिक रहती है। स्टारटॉक के उच्च-स्तरीय प्रशासनिक अधिकारी स्वयं भाषा-शिक्षण क्षेत्र के शोध और विधियों में बड़े निष्णात हैं। वे अन्य अमरीकी विद्वानों के साथ मिलकर इन कार्यक्रमों की सफलता के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन करते हैं। हिन्दी में भी ये कार्यक्रम वर्षानुवर्ष पनप रहे हैं। इनके बारे में कुछ आंकड़े इस लेख में आगे प्रस्तुत किए जाएँगे।
सामाजिक स्तर पर अनेक स्वयंसेवी संस्थाएँ अमेरिका के युवा-जगत के लिए हिन्दी भाषा और उससे संबंधित संस्कृति की कक्षाएँ चला रही हैं। इस संस्थाओं में विशेष उल्लेखनीय संस्थाएँ हैं – हिन्दी यू. एस. ए., बाल-विहार, यू एस हिन्दी एसोसिएशन, चिन्मय मिशन, बाल गोकुलम्, अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति, विश्व हिन्दी न्यास, विद्यालय। इन संस्थाओं में बड़े निस्स्वार्थ भाव से और बड़ी लगन से काम करने वालों की कमी नहीं है। इसके अतिरिक्त 2009 में युवा हिन्दी संस्थान का निर्माण हुआ जिसके तत्वावधान में 2010 में एटलांटा (जार्जिया प्रदेश) और 2011 में न्यू-अर्क (डेलेवेयर प्रदेश) में युवाओं को हिन्दी भाषा और संस्कृति सिखाने के लिए विशाल शिविरों का आयोजन किया गया। ये शिविर दस-दस दिन तक चले। 2012 में इसी प्रकार के एक विशाल शिविर का आयोजन पेन्सिल्वेनिया में करने के लिए काम आरंभ हो चुका है। स्वयंसेवी संस्थाओं के अतिरिक्त कुछ सरकारी विद्यालयों में भी हिन्दी का औपचारिक शिक्षण शुरू हो चुका है। इस विषय में टेक्सस, न्यू जर्सी और न्यूयार्क प्रदेश के कुछ स्कूलों में हिन्दी औपचारिक रूप से पाठ्यक्रम में सम्मिलित की जा चुकी है। जहाँ तक विश्वविद्यालयों का संबंध है – अमेरिका के लगभग 100 महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। लगभग 4 वर्ष पूर्व अमेरिका सरकार ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस (ऑस्टन नगर) को हिन्दी की शिक्षा को अमेरिका में बढ़ाने के लिए एक विशाल हिन्दी कार्यक्रम के लिए एक बहुत बड़ी राशि का अनुदान दिया। यह हिन्दी उर्दू फ़्लैगशिप नामक कार्यक्रम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडियन स्टडीज़, जो लगभग 60 विश्वविद्यालयों की छत्र-संस्था है, विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए पिछले लगभग 50 वर्षों से अमरीकी विद्यार्थियों के लिए विशेष भाषा-कार्यक्रम भारत में चला रही है। इन कार्यक्रमों में हिन्दी का कार्यक्रम जो जयपुर में चलता है सबसे बड़ा है। वहाँ पूरे वर्ष भाषा-शिक्षण-विधियों के साथ आधुनिकतम तरीकों से उच्च-स्तरीय और प्रशिक्षित शिक्षकों की देख-रख में हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त अमेरिका की सरकार ने पिछले दो वर्षों से दो और नए कार्यक्रमों की घोषणा की है जिनके अन्तर्गत कालेज और हाई स्कूल के विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति पर भारत भेजा जाता है। कुछ अमरीकी नागरिक अपने पैसे से भी हिन्दी पढ़ने के लिए भारत जाते हैं। इस प्रकार के विद्यार्थियों के लिए मसूरी में लैंगडोर का स्कूल एक प्रतिष्ठित केन्द्र है। इसी वर्ष यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेन्सिल्विनया में बिज़नेस की पढ़ाई के लिए जगत-विख्यात वार्टन स्कूल ने अपने एम.बी.ए. के उन विद्यार्थियों के लिए व्यवसायिक हिन्दी का एक विशेष पाठ्यक्रम शुरू किया हे जो भारत के बारे में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं। वार्टन स्कूल को देख कर अन्य बिज़नेस स्कूलों ने भी इस दिशा में सोचना आरंभ कर दिया है।
इन सब तथ्यों से हिन्दी के बारे में उभरती हुई रुचि अनेकानेक शैक्षिक केन्द्रों और सरकारी नीतियों में बड़े स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। भारत की अन्तःप्रांतीय राजभाषा के रूप में और अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर संख्या की दृष्टि से दूसरे (और कुछ विद्वानों के अनुसार तीसरे) स्थान पर आसीन इस महत्वपूर्ण भाषा के लिए अमेरिका जैसे विकसित देश में इस प्रकार का विस्तार पाना बड़े गौरव की बात है। परंतु इस तथ्यपरक मानचित्र का एक दूसरा पक्ष है जो विचारणीय है। अमेरिका में हिन्दी इतना आगे नहीं बढ़ पा रही जितना दूसरी भाषाएँ इस सकारात्मक वातावरण का लाभ उठा रही हैं।
वर्तमान अमरीकी संदर्भ में भारतीय भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन की स्थिति दुनिया की अन्य भाषाओं के सामने काफ़ी कमज़ोर नज़र आती है। हम यहाँ हिन्दी की तुलना चीनी, जापानी और अरबी से करेंगे। सबसे पहले देखते हैं कि चीनी और जापानी भाषाओं की तुलना में विश्वविद्यालय के स्तर पर हिन्दी की क्या स्थिति है। मॉडर्न लैंगवेज एसोसिएशन हर तीन से चार वर्ष में विश्वविद्यालय के स्तर पर विभिन्न भाषाओं को पढ़ने वाले छात्रों के आंकड़े एकत्र करती है। नीचे उपर्युक्त चार भाषाओं के आंकड़े दिए जा रहे हैं जिनसे तुलनात्मक स्थिति स्वयं स्पष्ट हो जाती है।
वर्ष 2002
|
वर्ष 2006
|
वर्ष 2009
| |
हिन्दी
|
1857
|
2339
|
2846
|
चीनी
|
34227
|
51695
|
61178
|
जापानी
|
52257
|
66635
|
73456
|
अरबी
|
10584
|
23997
|
35393
|
भारत की सब भाषाओं की संख्या को भी इन आंकड़ों में जोड़ लें तो भी हम बहुत ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते। भारत की बारह और भाषाएँ जो अमेरिका के अलग अलग केन्द्रों में पढ़ाई जाती है उनके पढ़ने वालों की संख्या भी बहुत थोड़ी है। संस्कृत, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली, तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम, वैदिक संस्कृत, पाली और उर्दू की कुल संख्या इस प्रकार है -
वर्ष 2002
|
वर्ष 2006
|
वर्ष 2009
|
964
|
1309
|
1584
|
इन आंकड़ों में 72 से 75 प्रतिशत संस्कृत, पंजाबी और उर्दू के आंकड़े हैं। संस्कृत की पढ़ाई धर्म, इतिहास आदि के शोध के कारण से है, उर्दू की पढ़ाई राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से है और पंजाबी की पढ़ाई स्थानीय सिख समुदाय के आर्थिक समर्थन के कारण से आगे बढ़ रही है। बाकी भारतीय भाषाओं के छात्रों की संख्या बिल्कुल नगण्य है। कहीं दो हैं तो कहीं चार हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अमरीकी विद्यार्थियों के लिए चीनी जापानी अरबी आदि अनेक भाषाओं की तुलना में भारत की भाषाएँ कम आकर्षक हैं।
आइए अब हम स्टारटॉक के आंकड़े देखें। स्टारटॉक में दो प्रकार के कार्यक्रम हैं – एक भाषा पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए और दूसरे भाषा-शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए।
छात्र-कार्यक्रमों की संख्या
वर्ष 2007
|
वर्ष 2008
|
वर्ष 2009
|
वर्ष 2010
|
वर्ष 2011
| |
हिन्दी
|
-
|
4
|
11
|
12
|
14
|
चीनी
|
18
|
37
|
45
|
54
|
63
|
अरबी
|
8
|
19
|
26
|
20
|
24
|
जापानी भाषा स्टारटॉक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है इसलिए उसके आंकड़े यहाँ शामिल नहीं हें।
शिक्षक-प्रशिक्षण-कार्यक्रमों की संख्या
वर्ष 2007
|
वर्ष 2008
|
वर्ष 2009
|
वर्ष 2010
|
वर्ष 2011
| |
हिन्दी
|
-
|
4
|
5
|
5
|
10
|
चीनी
|
17
|
27
|
33
|
44
|
49
|
अरबी
|
13
|
16
|
18
|
14
|
21
|
उपर्युक्त जानकारी कार्यक्रमों की कुल संख्या के बारे में थी। अब हम देखेंगे कि इन कार्यक्रमों में कितने कितने शिक्षार्थियों ने भाग लिया –
छात्र-कार्यक्रमों में भाग लेने वाले छात्रों की कुल संख्या
वर्ष 2007
|
वर्ष 2008
|
वर्ष 2009
|
वर्ष 2010
|
वर्ष 2011
| |
हिन्दी
|
-
|
57
|
255
|
386
|
580
|
चीनी
|
681
|
2079
|
3143
|
4242
|
5737
|
अरबी
|
193
|
431
|
820
|
632
|
803
|
शिक्षक-प्रशिक्षण-कार्यक्रमों में भाग लेने वाले शिक्षार्थियों की कुल संख्या
वर्ष 2007
|
वर्ष 2008
|
वर्ष 2009
|
वर्ष 2010
|
वर्ष 2011
| |
हिन्दी
|
-
|
35
|
48
|
60
|
47
|
चीनी
|
292
|
702
|
776
|
991
|
986
|
अरबी
|
156
|
293
|
317
|
263
|
323
|
कुल मिला कर अन्य भाषाएँ हिन्दी से कई गुणा आगे हैं। उच्च शिक्षा केन्द्रों में चीनी और जापानी भाषाओं को पढ़ने वाले छात्रों की बड़ी संख्या के दो बड़े रहस्य हैं – एक तो यह कि अमेरिका स्थित उनके प्रवासी समाजों में अपनी भाषा के प्रति बहुत उत्साह है और दूसरा बड़ा कारण है उन देशों की सरकारों का सुनियोजित ढंग से अपनी भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिए बौद्धिक, भावनात्मक और आर्थिक समर्थन। चीन की सरकार के शिक्षा मंत्रालय से पोषित एक संस्था है जिसका अंग्रेज़ी नाम है ऑफ़िस ऑफ़ चाइनीज़ लैंगवेज इंटरनेशनल जो संक्षेप में हानबान के नाम से जानी जाती है। इस संस्था का मिशन स्टेटमेंट है चीनी भाषा और संस्कृति का अन्य देशों में प्रचार-प्रसार और इस प्रकार इसका काम है दूसरे देशों में चीनी भाषा की पढ़ाई का संवर्धन। । इसका बजट बहुत बड़ा है और इसके काम को आगे बढ़ाने के लिए दुनिया के अनेक देशों में स्थानीय संस्थाओं का जाल बिछा हुआ है। इस संस्थाओं में एक है कनफ़्यूशस इंस्टीट्यूट जो अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों के परिसर पर विद्यमान है। भाषा की दृष्टि से यह संस्था स्कूलों और कालेजों को चीनी भाषा के पाठ्यक्रम, पाठ्य सामग्री का संग्रहण और प्रशिक्षित शिक्षकों की आपूर्ति में मदद करती है। इसके इलावा न्यूयार्क में एशिया इंस्टीट्यूट मे चीनी भाषा की पढ़ाई को आगे बढ़ाने के लिए एक विशेष विभाग है। इसी प्रकार अमेरिका में कॉलेज बोर्ड नाम की एक ग़ैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्था है जो सामान्य से सब विद्यार्थियों को कॉलेज की पढ़ाई के लिए सहायता प्रदान करती है। यहां चीनी भाषा को अमेरिका के शिक्षा-क्षेत्र में फैलाने के लिए तीन विशिष्ट कार्यक्रमों का आयोजन होता है और ये कार्यक्रम हैं – कनफ़्यूशस और चाईनीज़ प्रोग्राम, गेस्ट टीचर प्रोग्राम और चाईनीज़ ब्रिज डेलिगेशन। इस कार्यक्रम के तहत सैंकड़ों शिक्षक चीन से हर साल अमेरिका लाए जाते हैं। ये कुछ बड़े बड़े उदाहरण हैं।
इसी प्रकार जापानी भाषा के संवर्धन के लिए भी संस्था-गत कार्यक्रमों का एक विस्तृत ब्यौरा पेश किया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी संस्था है द जापान फ़ाऊंडेशन। इसके अधीन द जैपनीज़ लैंगवेज इंस्टीट्यूट एक विस्तृत विश्व-व्यापी कार्यक्रम है। इसका बजट भी बहुत बड़ा है और जापानी संस्कृति और भाषा का शैक्षिक क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार इसका लक्ष्य है। अमेरिका में इसकी दो बड़ी शाखाएँ हैं – एक कैलीफ़ोर्निया प्रदेश के लॉस एंजलिस नगर में और दूसरी न्यू यार्क में। दोनों शाखाएँ विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त जापानी भाषा-कार्यक्रमों के प्रसार और उनके सशक्तीकरण में विशिष्ट सहायता और योगदान प्रदान करती हैं। अब पिछले कई वर्षों से कोरिया भी इस दिशा में बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है जिसके फलस्वरूप अमरीकन विश्वविद्यालयों में कोरियन भाषा की पढ़ाई बहुत प्रगति कर रही है (2009 में कोरियन भाषा पढ़ने वालों की संख्या 8511 थी)। इस प्रकार के कार्यक्रम बहुत से दूसरे देश भी अपनी अपनी भाषाओं के प्रचार-प्रसार के निमित्त चलाते हैं जिनमें फ़्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन आदि उल्लेखनीय नाम हैं। इन देशों की एलियंस फ़्रांसे, गोइथे इंस्टीट्यूट, ब्रिटिश कौंसिल संस्थाएँ हैं जिनकी गतिविधियों में भाषा का महत्वपूर्ण विषय रहता है।
इन सब देशों की तुलना में भारत अपनी भाषा के प्रति उदासीन है। लड़खड़ाती अंग्रेज़ी के मोह ने भारतीय जन-मानस को जकड़ रखा है और यही कारण लगता है कि भारतीय भाषाओं का शिक्षण-प्रशिक्षण भारत में भी कमज़ोर है और दूसरे देशों में भी। भारत देश की आंतरिक प्रगति के लिए और विश्व-मंच पर भारत के सम्मान्य स्थान के लिए इसका निहितार्थ क्या है यह एक विचारणीय विषय हे।
इस लेख का समापन मैं एक व्यक्तिगत अनुभव से करूँगा। यह व्यक्तिगत अनुभव स्व-भाषा के प्रति भारतीय और चीनी सोच की स्थिति को एकदम स्पष्ट कर देगा। शायद दो साल पहले की बात है कि अमेरिका के एक सरकारी स्कूल ने स्टारटॉक के लिए दो आवेदन-पत्र एक साथ दिए थे – एक हिन्दी के लिए और एक चीनी के लिए। उनके आवेदन-पत्रों की प्रस्तुति बहुत प्रभावी रही होगी जिसके कारण स्टारटॉक के राष्ट्रीय कड़े मुकाबले में इस स्कूल के दोनों आवेदन स्वीकृत हो गए। परिणाम पता लगने पर स्कूल के अधिकारियों के हर्ष का पारावार न रहा। स्कूल में बड़े उत्साह और बड़े उल्लास का वातावरण बनना शुरू हुआ । उन्होंने अपने उत्साह की अभिव्यक्ति के रूप में भारतीय कौंसलावास और चीनी कौंसलावास को एक एक पत्र भेजा जिसमें उन्होंने हिन्दी और चीनी के अपने नए ग्रीष्मकालीन कार्यक्रमों का यह सुखद समाचार उनके साथ बाँटा। चीनी दूतावास से कुछ दिनों में बधाई का जवाब आया और उस पत्र के साथ कौंसलाधीश ने दस हज़ार डालर का चैक भी भेज दिया और कहा कि चीनी भाषा के कार्यक्रम को और अच्छा बनाने के लिए कृपया आप इस धन का उपयोग करें। स्कूल के अधिकारियों का उत्साह दुगना-चौगुना हो गया। वे भारतीय कौंसलावास से भी बधाई के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे लेकिन वहाँ से कोई उत्तर ही नहीं आया। जब यह घटना हमें बताई गई तो हम उनके सामने कुछ शर्मिंदा भी हुए और अपने मन ही मन में फूट फूट कर रोए भी।
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