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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

सोशल मीडिया नियमन के अर्थ, अभिप्राय व भविष्य : डॉ. कविता वाचक्नवी

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 11:30 pm लेबल: International, Kavita Vachaknavee, Social, Social Media

 



भारत- सरकार ने आज सोशल मीडिया की आचार-संहिता बनाने की दिशा में बड़ी पहल की है। मैं भारत सरकार को इस के निमित्त बहुत बधाई व साधुवाद देती हूँ। 

पूरे विश्व में सर्वप्रथम ऐसा कर भारत ने अपनी अग्रणी भूमिका को पुनर्प्रतितिष्ठित कर दिया है। व इसके माध्यम से भारत के जन-मानस की रक्षा का जो प्रावधान किया है, वह बहुत दूरगामी व दूरदर्शितापूर्ण निर्णय है।

ऐसा कर, दूसरे देशों से सञ्चालित बड़े लुभावने व मारक अस्त्रों से राष्ट्रीय संहार के निषेध के प्रति अपनी कटिबद्धता भी प्रदर्शित की है, व राष्ट्रीय सकल आय के संरक्षण की दिशा में भी नयी पहल की है।

 वह इस प्रकार कि जैसे सस्ते का आकर्षण सर्वाधिक होता है, वैसे ही सस्तेपन व सनसनी-पूर्ण का भी। और सस्ता तो केवल झूठ बोल कर ही बेचा जा सकता है। जैसे ही सोशल मीडिया पर सस्ते, सस्तेपन, झूठ व सनसनी पर अंकुश लगेगा, तैसे ही भीड़ छँटने लगेगी व भीड़ छँटने से सोशल मीडिया के विभिन्न मञ्चों के विदेशी व्यापारियों की दुकानें मन्द पड़ जाएँगी। अपने सोशल मीडिया के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को व्यापारिक केन्द्र बनाए रखने के लिए विदेशी व्यापारियों को आचार-संहिता का अंकुश स्वीकारना होगा। न स्वीकारने पर वे व्यापार न कर सकेंगे और इस प्रकार स्थानीय व्यापारिक प्रतिष्ठानों को अवसर मिलेगा। यह तो रही नियमन में निहित राष्ट्रीय आर्थिक सूझ की दृष्टि।

कुछ लोगों को नियमन के प्रावधानों की इस सूचना से बहुत छटपटाहट अनुभव हो रही है। उसका कारण भी सहानुभूतिपूर्वक समझा जा सकता है, क्योंकि समाज अभी इस नियमन का अभ्यस्त नहीं है। अतः ऐसा सोचना स्वाभाविक है। दूसरा कारक यह भी भविष्य में उभर कर आ सकता है कि जिन का निजी लाभ आहत होगा, वे इस के विरोध व बहिष्कार हेतु नए-नए तर्क व उपाय अपनाएँगे।

समाज व प्रयोक्ताओं को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यम अपेक्षाकृत नए मञ्च हैं, अतः नियम भी नए ही होंगे। पहले जब फिल्में बननी शुरु हुईं, तो फिर पश्चात् फ़िल्म सेंसर बोर्ड भी बना। भारत ई.1947 में मुक्त हुआ तो वर्ष 50 में उस का भी संविधान और नियम-कायदे बने। 

इधर ट्वीटर, फेसबुक, इन्स्टाग्राम ने जो निरंकुशता दिखाई है और अपने मञ्चों का राजनैतिक दुरुपयोग होने दिया है, उस के पश्चात् यह अनिवार्य था कि इन व्यापारिक संस्थानों को इन का सही स्थान दिखाया जाए। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की पक्षधरता के नाम पर जिस प्रकार विध्वंस की पक्षधरता व पैसा लेकर प्रायोजित विचारधारा के समर्थन मेँ ये अभिव्यक्ति मञ्च विरोधी विचारधारा वालों की अभिव्यक्ति का गला घोंटने की होड़ मेँ अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय व सफल हुए हैं,  वह किसी से छिपा नहीं। प्रायोजक  धनपतियों द्वारा अथवा पैसे के बल पर जिस प्रकार के राजनैतिक हित साधे जा रहे हैं, उन पर अंकुश आवश्यक था। मुझे स्मरण है, वर्ष 2010 में हम ने वर्धा विश्व विद्यालय में सोशल मीडिया हेतु आचार संहिता की अनिवार्यता पर दो दिवसीय अन्तर-राष्ट्रीय संगोष्ठी की थी, जिसमें भारत के सुप्रीम कोर्ट में साइबर क्राइम के सर्व प्रमुख अधिवक्ता पवन दुग्गल भी सम्मिलित हुए थे और उन्होंने सोशल मीडिया की आचार संहिता पर बल दिया था, अनिवार्यता बतलाई थी। उस का संक्षिप्त विवरण यहाँ देखा जा सकता है। अस्तु !

 जिस अनुपात में सोशल मीडिया के साथ-साथ समानान्तर मीडिया हाउस (यथा नेटफ्लिक्स आदि) का प्रयोग विस्तार पा रहा है, उन से भी कई गुना अधिक अनुपात में, उन पर लोगों को धोखा देना, छलना, झूठ फैलाना आदि सरल हो गया है। जैसे एक समय  रेडियो, फिल्में व समाचार पत्र जन- सूचना व सञ्चार का मुख्य माध्यम थे, वैसे ही फिर एक दिन टीवी आया और तत्पश्चात् सोशल मीडिया। 

अब लोगों के अपने चैनल व अपने लाखों-लाख फॉलोवर्ज़ हैं, जिन के कथ्य व प्रस्तुति पर किसी का कोई अंकुश नहीं। उन्हें सोशल मीडिया के व्यापारिक प्रतिष्ठान निश्शुल्क यह सुविधा देते हैं और बदले में उन की व उन के माध्यम से उन के देशों की गति-मति व नीति को नियन्त्रण में ले लेते हैं।

इन दुरुपयोगों का समाधान व इन पर अंकुश अनिवार्य है, क्योंकि व्यापारिक प्रतिष्ठान केवल लाभार्थ सञ्चालित होते हैं और सञ्चालकों के लिए निजी लाभ सर्वोपरि होता है। अतः उन का क्रय-विक्रय (खरीद-फ़रोख़्त) बहुत सरल-सम्भव है। वे निजी लाभ हेतु हैं व तदर्थ प्रयोक्ताओं, प्रयोक्ता समाज, सामाजिक मूल्यों, पारिवारिक मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति कदापि कटिबद्ध नहीं होते। उनके निमित्त मूल्यवत्ता का अर्थ, मात्र आर्थिक मूल्य होता है, समाज- सांस्कृतिक मूल्य नहीं।

जिस देश, भाषा, समाज व इकाई को आर्थिक मूल्यों से इतर अन्य मूल्यों की जिस अनुपात में चिन्ता होती है, वह उतने अनुपात में इन माध्यमों की निरंकुशता पर अंकुश कसने को प्राथमिकता देता है। हम ने देखा है, जो परिवार अपनी पारिवारिकता व सम्बन्धों को महत्व देते हैं, वे भोजन की मेज पर, अथवा पारिवारिक या शैक्षिक समयावधि में मोबाइल के निषेध के उपाय करते हैं। क्योंकि इस के झूठ, चमक व आकर्षण ने निजी सम्बन्धों व प्राथमिकताओं तक का अभूतपूर्व संहार किया है।

विशेषतः ऐसे समय में जब विद्यालयों तक में बच्चों को पठन-पाठन हेतु लैपटॉप / मोबाइल दिए जा रहे हैं, शिक्षा व कामकाज सब कुछ ऑनलाइन हो रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया उस कच्ची वयस् वालों के लिए निरंकुश यौन-अपराधों का बड़ा केन्द्र बन रहा है। 'ट्वीटर' पर 'पॉर्न' इतने सरल व खुले में उपलब्ध है कि माता-पिता इन का कोई समाधान न खोज पाने की स्थिति में पीड़ा से कराह रहे हैं। उन के द्वारा अंकुश के सब उपाय विफल हो जाते हैं और पारिवारिक सम्बन्ध विच्छिन्न।

मानव-तस्करी का बड़ा प्रतिष्ठान भी बन गए हैं ये सोशल मीडिया मञ्च।  इस विषय पर स्वतन्त्र रूप से विस्तार से लिखने के अनेक बिन्दु मन में हैं, किन्तु उन पर कभी अलग से। अभी तो केवल सङ्केत-मात्र ही यहाँ पर्याप्त है।

संक्षेप में कहूँ तो वस्तुतः ऐसे  प्रत्येक व्यक्ति को (जिस के लिए व्यक्तिगत मूल्य (चरित्र आदि), पारिवारिक मूल्य, सामाजिक मूल्य, साँस्कृतिक मूल्य, राष्ट्रीय मूल्य व राजनैतिक मूल्य आदि कुछ भी अल्पमात्र भी महत्व रखते हैं) इस नियमन का खुले हृदय से स्वागत करना चाहिए, समर्थन करना चाहिए। यह भविष्य में हमारे परिवारों, राष्ट्र, संस्कृति, इतिहास, ईमानदारी, राजनीति व राष्ट्रीय अस्मिता की सुरक्षा की ओर पहला डग है। 

इस का सहर्ष स्वागत कीजिए।

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मंगलवार, 21 जुलाई 2020

आमन्त्रण : युद्ध अनवरत शेष हमारे : कवि सम्मेलन

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 12:23 am लेबल: विश्वम्भरा, Hindi, Hindi in America, Hindi Literature, Kavita Vachaknavee

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शनिवार, 11 जुलाई 2020

विश्वम्भरा : 'एक घरौंदा मेरे भीतर' (अन्तरराष्ट्रीय कवयित्री सम्मेलन) LIVE

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 7:50 am लेबल: विश्वम्भरा, America, Hindi : as an international language, Hindi Literature, Kavita Vachaknavee
  
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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

एक घरौंदा मेरे भीतर : विश्वम्भरा अन्तर-राष्ट्रीय कवयित्री सम्मेलन

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 9:03 pm लेबल: प्रवासी हिन्दी साहित्य, विश्वम्भरा, America, Hindi, Hindi Literature, International Conference, Kavita Vachaknavee

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शुक्रवार, 1 मई 2020

विश्वम्भरा : वर्तमान कलेवर

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 11:51 pm लेबल: विश्वम्भरा, Hindi, Hindi : as an international language, Hindi Literature, Kavita Vachaknavee
आज हम कहाँ हैं : आचार्य कविता वाचक्नवी 


संस्था का इतिहास व संक्षिप्त औपचारिक परिचय वर्ष 2001 में इस पृष्ठ कड़ी पर लिखे जाने के पश्चात्, अब 'विश्वम्भरा हिन्दी-लेखिका संघ' (भारतवंशी लेखिकाओं का संगठन), विश्वम्भरा हिन्दी-संघ (अमेरिका, भारत व योरोप में भाषा के प्र्योजनमूलक पक्षों के विस्तार व संवर्धन हेतु), विश्वम्भरा वैदिक स्वाध्याय (भारतीय वैदिक वाङ्मय, शिक्षा आदि पक्षों के प्रचार-प्रसार हेतु) अधुनातन माध्यमों व विधियों से अनेकानेक क्षेत्रों में  शिशुओं से लेकर वृद्धावस्था तक के लोगों हेतु कार्य कर रही है।  
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मंगलवार, 26 मार्च 2013

भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 8:16 pm लेबल: विश्वम्भरा, HCIL, Hindi, Hindi : as an international language, Hindi in UK, Indian High Commission, Kavita Vachaknavee, UK Hindi Awards at India House, World Hindi Day

भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न
डॉ.कविता वाचक्नवी को ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’ प्रदत्त

लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.

ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण. 


डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त स्मृतिचिह्न और प्रशस्तिपत्र

 डॉ. कविता वाचक्नवी को  स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती. 

 “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा

डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त प्रशस्ति-पत्र

भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा

 “ सम्मान-समारोह"

 सम्पन्न 

24 मार्च 2013

भारतीय जीवन मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार की संस्था “विश्वम्भरा” की संस्थापक-महासचिव डॉ.कविता वाचक्नवी को विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा इण्डिया हाउस में आयोजित समारोह में “आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान” किया गया। इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त महामहिम डा. जे॰ भगवती ने उन्हें नकद राशि, स्मृति चिह्न, शॉल और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए। उन्हें यह सम्मान मुख्यतः इन्टरनेट व प्रिंट मीडिया द्वारा भाषा, साहित्य, संस्कृति व पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है.


उल्लेखनीय है कि अमृतसर में जन्मीं कविता वाचक्नवी समाज-भाषा-विज्ञान तथा काव्यसमीक्षा जैसे विषयों में 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद' से एमफिल और पीएचडी अर्जित करने के बाद सपरिवार लन्दन में रह रही हैं. भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ कविता वाचक्नवी ने अपने दादाश्री व पिताश्री का विशेष उल्लेख किया व लाहौर से हिमाचल और पंजाब तक उनके किए कार्यों व बलिदानों को उपस्थितों के साथ बाँटते हुए बताया कि कैसे हिन्दी सत्याग्रह में जेल में रहने से लेकर हिमाचल को हिन्दीभाषी राज्य का दर्जा दिलाने तक के लिए उनके परिवार ने कष्ट सहे। वाचक्नवी ने अपना सम्मान उन्हीं को समर्पित करते हुए कहा कि वे यह सम्मान उनके प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर रही हैं। उन्होंने राजदूत व उच्चायोग से अनुरोध किया कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग की वेबसाईट को द्विभाषी बनाया जाना चाहिए व उसे अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी उपलब्ध होना चाहिए।


विज्ञप्ति के अनुसार इस समारोह में दो अन्य विशिष्ट हिंदी सेवियों तथा एक हिंदी संस्था को भी सम्मान प्रदान किए गए. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” से यॉर्क विश्वविद्यालय के विख्यात भाषाविद प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा को तथा “डा॰ हरिवंश राय बच्चन हिन्दी साहित्य सम्मान” से बर्मिंघम के हिंदी लेखक डॉ॰ कृष्ण कुमार को सम्मानित किया गया जबकि नाटिङ्घम की संस्था “काव्य रंग” को “फ़्रेडरिक पिनकोट हिन्दी प्रचार सम्मान” प्रदान किया गया.


इस अवसर पर सम्मानितों को बधाई देते हुए सभा को संबोधित अपना वक्तव्य हिन्दी में देते हुए उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती ने कहा कि वे स्वयं असमिया भाषी होते हुए दिल्ली में रहने के कारण हिन्दी में व्यवहार करते रहे हैं व उनकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रही है। उन्होने ज़ोर देकर कहा कि निजी रूप से वे त्रिभाषा नीति को भारत के लिए श्रेयस्कर समझते हैं। विश्व पटल पर भारत से बाहर के लोगों के लिए अंग्रेजी, समस्त भारतीय कार्यकलापों के लिए हिन्दी व अपनी मातृभाषा अथवा एक प्रांतीय भाषा प्रत्येक भारतीय को अवश्य सीखनी पढ़नी चाहिए।


“जॉन गिलक्रिस्ट यू.के.हिन्दी शिक्षण सम्मान” स्वीकार करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा ने अपने वक्तव्य में यॉर्क विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम हिन्दी अध्यापन प्रारम्भ होने सम्बन्धी अपने संस्मरण सुनाए और यूके में हिन्दी अध्यापन से जुड़ी स्थितियों का उल्लेख करते हुए 35 वर्ष के अध्यापन का उल्लेख किया। इसी प्रकार "डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ. कृष्ण कुमार ने भारत में संस्कृत, हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए भावपूर्ण अपील करते हुए चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर आने वाले दिनों में भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।


समारोह में “डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी प्रकाशन अनुदान योजना” के अंतर्गत श्रीमती उषा वर्मा को उनकी पुस्तक 'सिम कार्ड तथा अन्य कहानियाँ’ और डा॰ कृष्ण कन्हैया को उनके काव्य संग्रह 'किताब जिंदगी की’ के प्रकाशन हेतु नकद राशि और मानपत्र दिया गया।


लंदन स्थित इंडिया हाउस में हुए इस पुरस्कार समारोह में उप उच्चायुक्त डॉ. वीरेंद्र पाल और उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) एसएस सिद्धू भी उपस्थित थे। सिद्धू जी ने अपना स्वागत वक्तव्य हिन्दी में दिया व धन्यवाद वक्तव्य भी डॉ वीरेंद्र पॉल द्वारा हिन्दी में ही दिया गया। कार्यक्रम का संचालन उच्चायोग के हिन्दी व संस्कृति अताशे श्री बिनोद कुमार ने सफलतापूर्वक किया। ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में समारोह में उपस्थित थे ।

चित्र परिचय –
  • 1. लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.
  • 2. ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण.
  • 3. डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती.
  • 4. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा.
[प्रेषक – डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संवीक्षक – ‘विश्वम्भरा’), प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद-500004; मोबाइल – 08121435033]  
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स्थान: London, UK

मंगलवार, 27 मार्च 2012

यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी,स्पेन, 2012 :समग्र रिपोर्ट व विवरण

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 7:32 am लेबल: विश्वम्भरा, European Hindi Conference 2012, Hindi, Hindi : as an international language, International Conference, Kavita Vachaknavee

यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी,स्पेन, 2012 

समग्र रिपोर्ट व विवरण

- प्रो. श्रीश चंद्र जैसवाल 
 

इस संगोष्ठी का मूल उद्देश्य यूरोप के विभिन्न देशों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण पर दृष्टिपात करना था। इस संगोष्ठी ने हिन्दी के विश्व रूप पर प्रकाश डालते हुए हिन्दी अध्ययन और अध्यापन से संबंधित समस्याओं और उनके निदान पर चर्चा- परिचर्चा करने के लिए एक मंच प्रदान किया। संगोष्ठी में भारत सहित 21 देशों के 33 प्रतिष्ठित विद्वान सम्मिलित हुए।

संगोष्ठी का उद्घाटन वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के उपकुलपति, स्पेन में भारत के राजदूत, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय की डिप्टी डीन, कासा दे ला इंडिया के निदेशक तथा संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से किया गया। तदुरांत भारत सरकार के विदेश मंत्री महोदय श्री एस.एम. कृष्णा का संदेश पढ़ा गया। विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो.मार्कोस साक्रिस्तान ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि प्रागैतिहासिक काल से ही वय्यादोलिद शहर तथा विश्वविद्यालय पर एशिया का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। इन देशों की संस्कृति के प्रभाव से वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में एशियाई अध्ययन की परम्परा का सूत्रपात हुआ। वर्ष 2000 में एशियन स्टडीज़ सेंटर की स्थापना हुई । वय्यादोलिद के विश्वविद्यालय एशियन स्टडीज़ ने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के सौजन्य से वय्यादोलिद, स्पेन में 15,16&17 मार्च,2012 को “विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य” विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की। भारतीय दूतावास माद्रिद और कासा दे ला इंडिया के पूर्ण सहयोग से ही स्पेन में पहली संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ।

इस केन्द्र में प्राचीन तथा आधुनिक भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक पक्षों के बारे में कई संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। वय्यादोलिद विश्वविद्यालय भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सहयोग से भारतीय अध्ययन में एक स्नातकोत्तर डिग्री आरम्भ करने जा रहा है, जो क्रियान्वयन के अंतिम चरण में है। हिन्दी भाषा के अध्यापन की दिशा में भी वय्यादोलिद विश्वविद्यालय अग्रणीय है। वर्ष 2004 में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सहयोग से वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में विभिन्न स्तरों पर हिन्दी भाषा का अध्यापन शुरू हुआ।

भारत तथा स्पेन के मध्य सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने के लिए वर्ष 2003 में स्पेन में वय्यादोलिद की नगर परिषद, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सौजन्य से कासा दे ला इंडिया की स्थापना की गई, जिसमें विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। स्पेन तथा भारत के संबंध द्रुत गति से बढ़ रहे हैं और यह विकास शैक्षिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग में दिखाई देना चाहिए।


स्पेन के भारतीय राजदूत महोदय श्री सुनील लाल ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने भाषण में हिंदी की संपन्न परंपरा का ज़िक्र करते हुए बताया कि अन्य भारतीय भाषाओँ के संपर्क में आने के कारण हिंदी स्वयं लाभान्वित हुई है तथा उसने उन्हें भी लाभान्वित किया है। भारत की 22 स्वीकृत भाषाएँ उसकी बहुभाषिकता स्थिति को द्योदित करती हैं तथा राजभाषा के माध्यम से भारत की अनेकता में एकता परिलक्षित होती है। विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र भारतवर्ष 2050 तक सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था के रूप में उभरेगा और अन्तर्राष्ट्रीय कार्य बल में महत्वपूर्ण भारतीय साझेदारी के कारण हिंदी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित होगी। उन्होंने संगोष्ठी की सफलता के लिए शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस संगोष्ठी में सम्मिलित सभी विद्वान योरोप में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण को और प्रभावी बनाने के तरीकों पर विचार विमर्श करेंगे और अध्यापन में भाषा के साथ भारत की संस्कृति और दर्शन का भी समन्वय करेंगे। 

प्रो. उदय नारायण सिंह ने ‘नया शतक नई दिशा - भारतीय भाषाओँ के शिक्षण की समस्याएं और संभावनाएं’ विषय पर अपना बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा की अपनी पहचान होती है और उनके पठन पाठन की अपनी समस्याएं होती हैं। भारतीय बहुभाषिकता के वातावरण में हिंदी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अंग्रेज़ी, स्थानीय भाषाएँ और बोलियां हिंदी की शब्दावली और अक्सर संरचना को भी प्रभावित करती हैं। हिंदी के विदेशी अध्येताओं को इसका ज्ञान अवश्य देना चाहिए। उन्हें भारतीय व्यवहार की स्थिति से अवगत कराना आवश्यक है। हिंदी एक ओर मानक हिंदी है, जो साहित्य में व्यवहृत होती है तो दूसरी ओर बोलचाल की मिश्र हिंदी है, जिसका प्रयोग आम जनता करती है और उसे टेलिविज़न पर भी देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना आवश्यक है कि हिंदी एक भाषा संसार का नाम है, सीमित क्षेत्र का वाचिक संप्रेक्षण माध्यम मात्र नहीं। हिंदी भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सम्प्रति हमारे समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं, जिसके लिए हमें कुछ अनोखे और असाधारण ढंग से सोचने विचारने की आवश्यकता है।

बीज भाषण के उपरांत संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक प्रोफ़ेसर श्रीश चंद्र जैसवाल ने संगोष्ठी के आयोजकों की ओर से सर्वप्रथम भारत सरकार के विदेश मंत्री महोदय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी शुभकामनाएं हमारे इस शैक्षिक अनुष्ठान को सफलता पूर्वक संपन्न कर पाने में अत्यंत सहायक होंगी. उन्होंने विदेश मंत्रालय के प्रशासन एवं हिंदी विभाग को उनके सकारात्मक रवैये और उदार अनुदान के लिए आभार व्यक्त किया. 

वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के रैक्टर प्रो. मार्कोस साक्रिस्तान, वाइस रैक्टर प्रो.लुईस सांतोस,एशियन स्टडीज़ सेंटर के प्रो. ऑस्कर रामोस्त था उनके सहयोगियों ने संगोष्ठी के आदि से अंत तक पूर्ण सहयोग दिया, कासा दे ला इंडिया के निदेशक डॉ गियर्मो तथा उनके सहयोगियों के परिश्रम और संपर्कों के बिना इस संगोष्ठी का आयोजन असंभव था, इन सभी अधिकारियों को धन्यवाद देने के उपरांत उन्होंने पूर्व भारतीय राजदूत सुश्री सुजाता मेहता तथा नए राजदूत श्रद्धेय सुनील लाल, काउंसलर श्री बिराजा प्रसाद, सांस्कृतिक सचिव श्रीमती पोलोमी त्रिपाठी तथा काउंसलर श्री पिल्लै का के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उक्त सभी अधिकारियों के निरंतर सहयोग और दिशा निर्देशन संगोष्ठी के लिए नितान्त आवश्यक थे.

अंत में प्रो .जैसवाल ने संगोष्ठी में 21 देशों से आये हुए सभी गणमान्य प्रतिभागियों का हार्दिक धन्यवाद किया, जिनमें विश्व हिंदी सचिवालय की महासचिव श्रीमती पूनम जुनेजा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय, केन्द्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा के उपाध्यक्ष और विश्व प्रसिद्ध कवि श्री अशोक चक्रधर, विश्वभारती शान्तिनिकेतन के प्रोवाइस चांसलर प्रो. उदय नारायण सिंह, टेक्सस विश्वविद्यालय के एमरेटस प्रोफ़ेसर हर्मन ओल्फेन सम्मिलित थे. उन्होंने सभी प्रतिभागियों से आगामी सत्रों में सार्थक सहयोग की कामना की, जिससे स्पेन में आयोजित हिंदी की पहली संगोष्ठी को सफल बनाया जा सके।

संगोष्ठी के प्रथम शैक्षिक सत्र ‘पश्चिमी तथा मध्य यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ की अध्यक्षता प्रो. हर्मन वैन ऑल्फ़ेन ने की. इस सत्र में छह आलेख पढ़े गए।
न्यू यूनिवर्सिटी, लिस्बन के प्रो. अफज़ाल अहमद ने पुर्तगाल में हिन्दी शिक्षण का इतिहास बताते हुए आग्रह किया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के ज्ञान के साथ साथ भारत की विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता का ज्ञान भी कराया जाना चाहिए।

विएना विश्वविद्यालय की अलका चुडाल ने विएना में हिन्दी शिक्षण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सामने रखा तथा वर्तमान पाठ्यक्रम की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ के विद्यार्थी योग, शास्त्रीय संगीत और भारतीय नृत्य से आकर्षित होकर बारीकी से उन्हें समझने के लिए हिन्दी पढ़ते हैं।

तोरीनो विश्वविद्यालय की आलेस्सान्द्रा ने इटली में हिन्दी शिक्षण की जानकारी देते हुए इस तथ्य पर बल दिया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्रवेश मिल जाता है। उन्होंने बताया कि इटली के व्यापारिक निगमों में हिन्दी का ज्ञान रखने वाले विद्यार्थियों को रोज़गार के अवसर भी मिल रहे हैं।
यॉर्क विश्वविद्यालय के महेंद्र किशोर वर्मा ने मानक हिन्दी और/या प्रामाणिक हिन्दी पर अपने आलेख में पाठ्य सामग्री चयन और पाठ्य सामग्री की रचना के विषय से संबंधित बिंदुओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार भारत में हिन्दी के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए मानक हिन्दी तथा प्रामाणिक हिन्दी के महत्व की व्याख्या की जानी चाहिए। 

घेंट विश्वविद्यालय, बेल्जियम से आए रमेश चन्द्र शर्मा ने आग्रह किया कि हमें यूरोप के विश्वविद्यालयों में हिन्दी का एक सामाजिक वातावरण तैयार करना चाहिए, जिसमें एक ओर हिन्दी का भाषा वैज्ञानिक आधार हो दूसरी ओर उसका एक सामाजिक आधार हो। उन्होंने एक ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता व्यक्त की, जो शब्द और संस्कृति दोनों का ज्ञान दे सके। 

कासा एसिया, माद्रिद की शेफ़ाली वर्मा ने स्पेन में हिंदी के अध्येताओं के समक्ष आनेवाली व्यावहारिक कठिनाइयाँ रखीं और उनके समाधान के लिए आग्रह किया .

कुल मिलाकर यह सत्र हिन्दी से आत्मीय रिश्ता जोड़ने की आकांक्षा से युक्त सत्र रहा।

‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिंदी शिक्षण में उसका अनुप्रयोग’ विषय पर आधारित दूसरे शैक्षिक सत्र के अध्यक्ष थे प्रो.अशोक चक्रधर। इस सत्र के प्रारंभ में श्रीश जैसवाल ने हिन्दी के प्रचार प्रसार में अध्ययन – अध्यापन तथा उसे विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए कम्प्यूटर के अनुप्रयोग पर बल दिया। अशोक चक्रधर ने कहा कि हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिए भारत सरकार और विभिन्न संस्थानों को ही उत्तरदायी न माना जाए, वरन व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिए प्रयास किए जाएँ। अपनी रोचक और प्रभावी पावर पौइन्ट प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने कंप्यूटर पर उपलब्ध आधुनिकतम अनुप्रयोग दिखाए, जो हिन्दी शिक्षण के लिए नितांत उपयोगी हैं। हिन्दी के मानकीकरण के संबंध में सभी के प्रयासों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अशुद्धियों को छोड़कर प्रबुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।

गेनादी श्लोम्पर ने हिन्दी पाठ्य सामग्री निर्माण में टेलिविज़न व रेडियो आदि के महत्व पर प्रकाश डाला। टी.वी. समाचार के आधार पर हिन्दी शिक्षण सामग्री तैयार करते हुए उन्होंने चुनाव, सामाजिक आंदोलन, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध, खेलकूद आदि विषयक समाचारों को तथा भाषा की रोचकता और सुग्राह्यता को महत्व दिया।

प्रो. हर्मन वैन ऑल्फेन ने अमेरिका में हिन्दी शिक्षण संबंधी इतिहास का परिचय देते हुए कहा कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण 1985 के बाद वहाँ हिन्दी शिक्षण का तेज़ी से प्रसार हुआ। उन्होंने पिछले पचास वर्षों में हिन्दी भाषा शिक्षण में प्राद्योगिकी के प्रयोग का वर्णन करते हुए आधुनिक युग में उसकी उपयोगिता और नवीनतम विकासों के अनुप्रयोग पर बल दिया। 

ऐश्वर्ज कुमार ने बताया कि यूरोपीय आर्थिक मंदी हिन्दी के पठन पठान पर प्रभाव डाल रही है। हिन्दी के प्रति खुद हिन्दी भाषियों या भारतीयों की सोच मौजूदा स्थिति की जिम्मेदार है। इस मानसिकता को बदलना होगा ।

कविता वाचक्नवी ने भाषा प्रकार्यों के अधुनातन सन्दर्भ और हिन्दी विषय पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने वैश्वीकरण के सकारात्मक पक्षों के ऊपर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हिन्दी विश्व में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, किन्तु इंटरनेट आदि माध्यमों के प्रयोग में अन्य भाषाभाषियों से काफ़ी पीछे हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा समाज के लिए उपलब्ध सॉफ्टवेयर की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिन्दी को कंप्यूटर की चुनौती व प्रयोक्ता – सापेक्ष होने की यात्रा में बहुत आगे जाना अभी शेष है।

तृतीय शैक्षिक सत्र ‘शेष यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ पर केंद्रित था. इस सत्र की अध्यक्षता प्रो.मोहन कान्त गौतम ने की। 

इस सत्र के पहले वक्तव्य में स्लोवेनिया विश्वविद्यालय के अरुण मिश्र ने अपने विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि वहाँ के विद्यार्थियों को व्याकरण आदि विषयों के साथ साथ भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान दिया जाता है। शीघ्र ही वहाँ भारतीय अध्ययन प्रकोष्ठ को वैधानिक मान्यता मिलेगी और उसके साथ ही हिन्दी शिक्षण में तीव्र गति से प्रगति होगी।

बिल्जाना ज्रनिक ने ज़ाग्रेव विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण और हिंदी विभाग की अन्य गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए अपने विद्यार्थियों की भाषा अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ सामने रखीं तथा यह भी बताया कि वे कैसे उनका निदान करती हैं.

दानूता स्तासिक ने वारसा विश्वविद्यालय में हिन्दी के नियमित अध्ययन- अध्यापन की चर्चा करते हुए बताया कि अब तक 90 विद्यार्थियों को हिन्दी एम.ए. की डिग्री मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारा भरण पोषण करते हुए भूमंडलीकृत दुनिया में अपनी पहचान को भी स्थापित करने में सहायता देती है। 

हैंज़ वर्नर वेसलर ने उप्साला विश्वविद्यालय, स्वीडन में हिन्दी व संस्कृत के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ हिन्दी शिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहाँ के विद्यार्थियों में हिंदी मीडिया में अधिक दिलचस्पी है । 

इंदिरा गाज़िएवा ने रूसी सरकारी मानविकी विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण का चित्र उपस्थित करते हुए अध्यापन में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया। 

मॉस्को विश्वविद्यालय रूस की ल्युदमीला खोख्लोवा ने बताया कि साम्यवादी काल में विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से पार्टी साहित्य पढ़ाया जाता था, लेकिन रूस के पुनर्गठन के बाद हिन्दी शिक्षण पद्धति बदल गई। विद्यार्थियों की भारतीय संस्कृति. धर्म में बहुत जिज्ञासा है और उनके अनुसार उनके विश्वविद्यालय में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है।

बुखारा विश्वविद्यालय रूमानिया की सबीना पोपर्लान ने बताया के वहाँ भारतीय दर्शन और चिंतन के अध्ययन की एक परंपरा रही है। उनके विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति पर कई किताबें लिखी गई हैं। ज़्यादातर शोध कार्य भाषा विज्ञान से संबंधित होता है। 

एल्ते विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट की विजया सती ने कहा कि हंगरी में तीन वर्षों का इंडोलॉजी अध्ययन कराया जाता है I यहाँ का मूल उद्देश्य संवाद है, जिसके माध्यम से संस्कृति और हिन्दी की जानकारी भी दी जाती है, भारतीय संस्कृति से जुड़े उपादानों का परिचय भी दिया जाता है। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश की जाती है। 

मोहन कान्त गौतम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिन्दी के विकास की प्रक्रियाओं को हमें देखना है। हम इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए मीडिया का उपयोग कर सकते हैं। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश होनी चाहिए। इससे हमारे यूरोपीय विद्यार्थी हिन्दी का प्रयोग अपने रोज़गार के लिए कर सकते हैं। हिंदी भाषा का व्यावहारिक रूप अपनाना अधिक उपयुक्त है।

संगोष्ठी का चतुर्थ शैक्षिक सत्र ‘हिन्दी शिक्षण तथा पाठ्यक्रम संबंधी समस्याएं तथा समाधान’ श्री विभूति नारायण राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ. 

 सत्र के प्रारंभ में वर्धा विश्वविद्यालय के जगन्नाथन ने हिन्दी की दो प्रमुख समस्याओं – संदर्भानुसार उपयुक्त पाठ्यक्रमों व सन्दर्भ ग्रंथों की कमी और भाषा व भाषा शिक्षण दोनों ही क्षेत्रों में मानकीकरण के अभाव को सामने रखा। उन्होंने लचीले, समस्तरीय और गुणता वाले पाठ्यक्रम के निर्माण पर बल दिया, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सके और जो घटत्व के सिद्धांत का पालन करे। इस प्रकार सभी शैक्षिक संस्थाएं मानकीकरण के मंच पर एकत्र होकर देश विदेश के विद्वानों द्वारा निर्मित पाठ्य सामग्री का लाभ ले सकेंगी।

जे.एन.यू. दिल्ली की वैश्ना नारंग ने विदेशी भाषा के शिक्षण और भाषा को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के पक्षों के भेद उभारने का प्रयास किया। उन्होंने यूरोपीय सन्दर्भों में हिन्दी भाषा अध्ययन –अध्यापन प्रक्रिया के आधार पर हुए विदेशी भाषा अधिगम के अंतर्गत संज्ञान प्रक्रिया को स्पष्ट किया। 

वारसा विश्वविद्यालय के कैलाश नारायण तिवारी ने हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ाने के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की विभिन्नता को समाप्त करते हुए एक उच्च स्तरीय मानक पाठ्यक्रम के निर्माण की बात कही, जिसमें उन्होंने भारतीय तथा विदेशी विद्वानों के पूर्ण सहयोग पर बल दिया ।

लूसान विश्वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड के नवीन चन्द्र लोहानी ने ‘हिन्दी साहित्य शिक्षण के लिए आलोचना मानदंडों की मुश्किलों’ पर चर्चा करते हुए बताया कि हिन्दी साहित्य को समझने के मानदंड संस्कृत, काव्य शास्त्र, पाणिनि व्याकरण तथा विश्व के आलोचनाशास्त्रों से प्राप्त वैचारिकी द्वारा मिले हैं। 

सोफ़िया विश्वविद्यालय के नारायण राजू ने हिन्दी शिक्षण में भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक सन्दर्भ का महत्व स्थापित किया। 

लिस्बन विश्वविद्यालय से आए शिव कुमार सिंह ने पुर्तगाल में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण व्यवस्था से संबंधित चुनौतियों को प्रस्तुत किया। उन्होंने हिन्दी सीखने की प्रेरणा और शिक्षण पद्धतियों का ज़िक्र करते हुए सांस्कृतिक सन्दर्भों के महत्व को दर्शाया तथा यूरोप की स्थानीय भाषाओं में हिन्दी शिक्षण संसाधन तैयार करने पर बल दिया।

हैम्बर्ग विश्वविद्यालय की तात्याना ओरान्स्कया ने हिन्दी शिक्षण के संबंध में विश्व हिन्दी दिवस के महत्व के बारे में कुछ विचार रखते हुए उसकी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया तथा बताया कि यूरोपीय विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की समस्या के मूल में भारत की गृहभाषा- राजनीति ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक और राजनैतिक तथ्य भी हैं।

कासा एसिया, बार्सिलोना से आईं दीप्ति गुलानी ने स्पेन में हिन्दी भाषा अध्ययन की अपेक्षाओं और कठिनाइयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी शिक्षण की व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख किया और बताया कि स्पेन में हिन्दी के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है।

इस सत्र के अंतिम वक्ता लाइडन विश्वविद्यालय, नैदरलैंड के मोहन कान्त गौतम ने यूरोप में हिन्दी अध्ययन की विस्तृत समस्याएं और उनके समाधान पर अपनी प्रस्तुति की। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यूरोपियन संसद यूरोप में प्रचलित सभी भाषाओं को मान्यता प्रदान करेगी और हिन्दी भाषा तथा इसका विशाल साहित्य यूरोप की सभ्यता को और अधिक संपन्न करेगा।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. उदय नारायण सिंह ने की। इस सत्र में चारों शैक्षिक सत्रों की रिपोर्ट क्रमशः विजया सती, शिव कुमार सिंह. रमेश शर्मा तथा ऐश्वर्ज कुमार ने प्रस्तुत की। तदुपरांत संगोष्ठी में उठे सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई और अंत में संगोष्ठी की ओर से की जाने वाली संस्तुतियों पर विचार विमर्श हुआ। गंभीर चिंतन और पारस्परिक विचार विनिमय के बाद सर्वसम्मति से विदेश मंत्रालय के समक्ष निम्नलिखित संस्तुतियों को रखने का निर्णय हुआ –

  1. आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयॉर्क की प्रमुख संस्तुति “अन्तर्राष्ट्रीय मानक हिन्दी पाठ्यक्रम” की परियोजना को क्रियान्वित किया जाए और उसमें हिन्दी के सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भौं का समावेश किया जाए।
  2.  विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण में संलग्न भारतीय एवं भारतेतर प्राध्यापकों को भाषा शिक्षण प्रविधि. साहित्य शिक्षण प्रविधि. हिन्दी व्याकरण. हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ आदि विषयों में प्रशिक्षित किया जाए।
  3.  यूरोप में इस प्रकार की शैक्षिक संगोष्ठियां विदेश मंत्रालय के सहयोग से हर दो वर्ष में नियमित रूप से आयोजित की जाएँ। वर्ष 2014 की यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी वारसा विश्वविद्यालय में आयोजित करने का प्रस्ताव है।
  4. पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक 24 घंटे का हिन्दी भाषा चैनल प्रारम्भ किया जाए, जिसमें हिन्दी की सभी प्रयुक्तियाँ उपलब्ध हों तथा वेब पर हिन्दी की विशाल सामग्री को एक स्थान पर हिन्दी अध्येताओं को उपलब्ध कराया जाए।
  5.  अंग्रेज़ी से इतर विदेशी भाषाओं को दृष्टि में रखकर मल्टीमीडिया सहित हिन्दी शिक्षण सामग्री का निर्माण किया जाए।
  6. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण के लिए स्नातकोत्तर स्तर का पाठ्यक्रम विकसित किया जाए।
  7.  भारतीय संस्कृत संबंध परिषद द्वारा विभिन्न विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी पीठों की संख्या में वृद्धि की जाए।
  8.   हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी शिक्षण की उपयोगी पुस्तकें तथा मल्टी मीडिया सामग्री उन सभी विश्वविद्यालयों को विदेश मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराई जाएं, जहाँ हिन्दी अध्ययन अध्यापन की सुविधाएँ हैं।
  9. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के डायनमिक पोर्टल पर वर्चुअल क्लास रूम की व्यवस्था की जाए, जिसके माध्यम से विदेशों में अध्ययनरत हिन्दी विद्यार्थियों को हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के विद्वानों के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान उपलब्ध कराए जाएँ।
  10. विश्व में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण से संबंधित उक्त सभी संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और विश्व हिंदी सचिवालय,मॉरिशस उत्तरदायित्व लें तथा एतदर्थ प्रभावी परियोजनाएं बनाए।

समापन समारोह की अध्यक्ष एशियन स्टडीज़ की प्रो. ब्लांका ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर बधाई दी और आशा व्यक्त की कि इस अवधि में हुई विद्वत्तापूर्ण चर्चा - परिचर्चा से सभी प्रतिभागी लाभान्वित हुए होंगे। मुख्य अतिथि के रूप में विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस की महासचिव श्रीमती पूनम जुनेजा ने संगोष्ठी की सार्थकता को रेखांकित किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि विश्व हिंदी सचिवालय संगोष्ठी द्वारा की गई संस्तुतियों पर अपेक्षित कार्रवाई करेगा। विशिष्ट अतिथि महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि यह संगोष्ठी अपनी उत्कृष्टता के लिए याद की जायेगी। इसने आगामी संगोष्ठियों के लिए मानक स्थापित किये हैं। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी द्वारा पारित सभी संस्तुतियों का स्वागत है तथा उनका विश्वविद्यालय संस्तुतियों को क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व लेता है। संगोष्ठी की समाप्ति कासा दे ला इंडिया के निदेशक डॉ गियार्मो रोड्रगेज़ के धन्यवाद ज्ञापन से हुई।


भाषा और संस्कृति का अन्योन्याश्रित संबंध है। संगोष्ठी के पहले दिन गहन चिंतन और विचार मंथन के उपरांत शाम को कासा दे ला इंडिया के सभागार में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें स्पेन के जिप्सी समुदाय के पारंपरिक नृत्य फ़्लेमेंको को उसके भारतीय स्रोत से जोड़ने का प्रयास किया गया तथा साथ ही भरतनाट्यम, कत्थक, हंस वीणा, तबला और मृदंगम एवं फ़्लेमेंको नृत्य और गायन का अन्तर्राष्ट्रीय कलाकारों ने अद्भुत समागम किया। स्पेन की प्रसिद्ध भरतनाट्यम विशेषज्ञ मोनिका देला फुएंते द्वारा हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘इस पार प्रिये तुम हो मधु है’ पर किया गया मोहक नृत्य दर्शनीय था।
सांस्कृतिक कार्यक्रम के उपरांत भारतीय राजदूत महोदय द्वारा प्रतिभागियों के स्वागत में प्रीति भोज दिया गया।

संगोष्ठी में सभी प्रतिभागियों को स्थानीय परिभ्रमण के लिए भी ले जाया गया । इस प्रकार स्पेन की पहली तीन दिवसीय संगोष्ठी यूरोप में हिंदी के उज्जवल भविष्य की कामना के साथ संपन्न हुई I


- शैक्षिक निदेशक हिंदी संगोष्ठी
वय्यादोलिद विश्वविद्यालय
स्पेन






यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी, 2012 के वक्ताओं की वर्णक्रमानुसार सूची
 
1.    अफ़ज़ल अहमद, प्रोफ़ेसर, लिस्बन विश्व विद्यालय, पुर्तगाल
2.    अलका ऐत्रय चुडल, वरिष्ठ लेक्चरर, विएना विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रिया
3.    अलेस्सांद्रा कोंसोलारो, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, रोम विश्वविद्यालय, इटली
4.    अरूण प्रकाश मिश्रा.विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, स्लोवेनिया विश्वविद्यालय, स्लोवेनिया
5.    अशोक चक्रधर, उपाध्यक्ष,केन्द्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा, भारत 
6.    इंदिरा गाज़िएवा, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, मॉस्को विश्वविद्यालय, रूस
7.    उदय नारायण सिंह, प्रोवाइस चांसलर, विश्व भारती,कोलकाता, भारत
8.    ऐश्वर्य कुमार, हिंदी प्राध्यापक, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड 
9.    कविता वाचक्नवी, लेखिका, लंदन, इंग्लैंड
10.    कैलाश नारायण तिवारी, विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, वारसा विश्वविद्यालय, पोलैंड
11.    गेनादी श्लोम्पेर, हिंदी प्राध्यापक,तेलेविव विश्वविद्यालय, इजराइल
12.    जगन्नाथन वी.आर.,निदेशक, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, पूर्व प्रोफ़ेसर,इग्नू, दिल्ली, भारत
13.    जस्टीना कुरोव्सका, रिसर्च फ़ैलो , बॉन विश्वविद्यालय, जर्मनी
14.    तात्याना औरन्स्कया, हैम्बर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी
15.    दानूता स्तानिक, प्रोफ़ेसर,  वारसा विश्वविद्यालय, पौलेण्ड
16.    दीप्ति गोलानी, हिन्दी प्राध्यापक, कासा एशिया, बार्सीलोना, स्पेन
17.    नवीन चंद्र लोहानी, लूसान विश्वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड
18.    नारायण राजू वी.एस.एस.सिरीवुरी, विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, सोफ़िया विश्वविद्यालय, बल्गारिया
19.    पूनम जुनेजा, महासचिव , विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरिशस
20.    बिल्जाना ज़्रनिक, हिंदी प्राध्यापक, ज़ाग्रेब विश्वविद्यालय, क्रोएशिया
21.    महेंद्र किशोर वर्मा, ऑनरेरी फ़ैलो, यॉर्क विश्वविद्यालय, इंग्लैंड
22.    मोहन कान्त गौतम, प्रोफ़ेसर, पश्चिम व पूर्व यूरोपीय विश्वविद्यालय, नैदरलैंड
23.    रमेश शर्मा, विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, घेंट विश्वविद्यालय, बेल्जियम
24.    ल्युदमिला खोख्लोवा, एसोसि़एट प्रोफ़ेसर, मॉस्को स्टेट विश्वविद्यालय, रूस
25.    विजया सती, विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, एल्ते विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी
26.    विभूति नारायण राय, वाइस चांसलर, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, भारत
27.    वैश्ना नारंग, प्रोफ़ेसर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय,  दिल्ली, भारत
28.    शिव कुमार सिंह, लेक्चरर, लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल
29.    शेफ़ाली वर्मा,हिंदी प्राध्यापिका, कासा एशिया, माद्रिद, स्पेन
30.    श्रीश जैसवाल, विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय, स्पेन
31.    सबीना पोपर्लान, लेक्चरर, बुखारेस्ट विश्वविद्यालय, रोमानिया                  
32.    हर्मन वैन ऑलफ़ेन, प्रोफ़ेसर एमेरेटस, टेक्सस विश्वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका
33.    हैंज़ वेर्नर वैस्लर, विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, उप्साला विश्वविद्यालय, स्वीडन
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गुरुवार, 22 मार्च 2012

यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस और स्पेन : जैसा मैंने देखा : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 4:13 pm लेबल: European Hindi Conference 2012, Hindi, Hindi : as an international language, International Conference, Kavita Vachaknavee

यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस और स्पेन : जैसा मैंने देखा 
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी






गत दिनों स्पेन के वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में 15 से 17 मार्च को आयोजित होने जा रही यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012 की सूचना देते हुए उसके विभिन्न सत्रों का उल्लेख किया था। यहाँ क्लिक कर उसे देखा जा सकता है। 



तत्पश्चात् उसके विविध सत्रों, भागीदारी करने वाले विद्वानों व स्पेनिश मीडिया में उसकी कवरेज की कड़ियों सहित एक छोटी रिपोर्टनुमा जानकारी इस लिंक पर दी थी - देखें।



इस चार दिन के अपने प्रवास में अपने कैमरे से मैंने अनेकानेक चित्र भी लिए। इस प्रक्रिया में कुछ मित्रों ने भी इस तरह सहयोग दिया कि मैंने कई बार कैमरा उन्हें थमाया ताकि अपने कैमरे में मेरे भी कुछ चित्र आ सकें।



 विशेष बात यह है कि संगोष्ठी कक्ष से बाहर लिए गए सभी चित्र चलते-चलते धड़ाधड़ खीचे गए हैं और संगोष्ठी कक्ष के सभी चित्र अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे। इसलिए कुछ चित्र अपनी धज में पूर्ण या अच्छे नहीं भी आ सके हैं। 



17 मार्च का पूरा दिन मेड्रिड में घूमते हुए बिताया। वहाँ से सायं फ्लाईट के टेक ऑफ करने के बाद आकाश से भी जब तक स्पेन दीखता रहा, तब तक के चित्र लिए किन्तु मेरे पिकासा की सीमा इन 300 से अधिक चित्रों को अपलोड करने में पूरी चुक गई व अब उनके लिए यहाँ अवकाश नहीं होने से प्रारम्भ के व अंत के अनेक चित्र  छोड़ दिए हैं। शेष सभी चित्र स्लाईड के रूप में यहाँ आप सब से बाँट रही हूँ। अपनी अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत करवाइएगा।


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स्थान: Spain

सोमवार, 19 मार्च 2012

European Hindi Conference 2012, Spain

प्रस्तुतकर्ता Kavita Vachaknavee पर 7:38 pm लेबल: विश्व हिन्दी सचिवालय, European Hindi Conference 2012, Genady Shlomper, Hindi, Hindi : as an international language, International Conference, Kavita Vachaknavee
यूरोपियन हिन्दी कॉन्फ्रेंस 2012, स्पेन से लौटकर 
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी











गत दिनों मैंने स्पेन के वय्यादोलिद विश्व विद्यालय में 15 से 17 मार्च को आयोजित होने जा रही यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012 की सूचना देते हुए उसके विभिन्न सत्रों का उल्लेख किया था। यहाँ क्लिक कर उसे देखा जा सकता है। 



परसों रात्रि स्पेन की यात्रा से लौटी हूँ।  यह संगोष्ठी कल्पनातीत थी। अधिकांश ने जीवन में इतनी ठोस, सफल और सार्थक संगोष्ठी शायद ही देखी सुनी होगी। 21/22  देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी से सम्पन्न हुई अद्भुत वैचारिक संगोष्ठी की सफलता से अभिभूत हूँ।  


उन सब से मिलना मेरे जीवन का अविस्मरणीय अनुभव था। सब की सहज आत्मीयता व स्नेह से सराबोर हो कर लौटी हूँ, मानो एक नई संजीवनी शक्ति हाथ लग गई है। हिन्दी को लेकर छाई धुंध के पार भी कुछ साफ साफ दीख रहा है जैसे। 


 स्पेनिश मीडिया में इस संगोष्ठी की चर्चा के कुछ लिंक्स नीचे देखें -

El Norte de Castilla

ABC

Noticias Terra

Rtvcyl.es

Qué!


संगोष्ठी में भाग लेने वालों में (वर्णक्रमानुसार) अफजल अहमद (पुर्तगाल ), ऐश्वर्ज कुमार (केंब्रिज, ब्रिटेन), अलका आत्रेय (विएना, ऑस्ट्रिया),  आलेजान्द्रा कॉन्सेलारो (तोरीनो, इटली), अरुण प्रकाश मिश्र (स्लोवेनिया), अशोक चक्रधर (भारत), Asun Aller Petite (स्पेन), Biljana Zrnic (क्रोएशिया), धानुता स्तासिक (वारसा, पोलैंड), David Rodríguez Gómez (स्पेन), दीप्ति गोलानी (स्पेन), डॉ. कविता वाचक्नवी (लंदन, ब्रिटेन), डॉ.रामप्रसाद भट्ट (हैमबुर्ग, जर्मनी), डॉ. विजया सती (बुडापेस्ट, हंगरी), गेनादि श्लोम्पेर (इजरायल), Guillermo Rodríguez (स्पेन), Heinz Werner Wessler (उपासला, स्वीडन), हरमन वैन ऑल्फेन (ऑस्टिन, अमेरिका), इंदिरा गैजिएवा (मॉस्को, रूस), वी. रा. जगन्नाथन (भारत), जुस्टयना कुरोव्स्का (बॉन, जर्मनी), कैलाश नारायण तिवारी (वर्सोविया पॉलॉनिया), लुडमीला विक्टोरोव्ना खोकलोवा (मॉस्को, रूस), महेंद्र वर्मा (यॉर्क, ब्रिटेन), Maximilian Magrini Kunze, मोहन कान्त गौतम (हॉलैंड), नवीन चन्द्र लोहानी (स्विट्जरलैंड), पूनम जुनेजा (मॉरिशस),  नारायण राजू ( सोफिया, बुल्गारिया), रमेश शर्मा (ब्रूसेल्ज़, बेल्जियम), Raúl Ruano Pascual (स्पेन), सबीना पॉपर्लैन (बुखारेस्ट, रोमानिया), शेफाली वर्मा (स्पेन), शिव कुमार सिंह (लिस्बोआ, पुर्तगाल), श्रीशचन्द्र जैसवाल (वय्यादोलिद, स्पेन), तात्याना ओरेन्स्काईया (हैंबुर्ग, जर्मनी), उदय नारायण सिंह (भारत), वैष्णा नारंग (भारत), वानिया गांचेवा (सोफिया बुल्गारिया) व विभूति नारायण राय (भारत) आदि प्रतिनिधियों के अतिरिक्त  स्पेन में भारत के राजदूत, कासाइंदिया के निदेशक, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के कुलपति व एशियन स्टडीज़ की अध्यक्षा सहित कई गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित थे। 


संगोष्ठी के अलग अलग अवसरों के चित्र मेरे कैमरे में हैं। जिन्हें यथाशीघ्र यात्रा विवरण, कार्यक्रम की विशद रिपोर्ट आदि सहित पुनः प्रस्तुत करूँगी। बस कुछ विलंब हो सकता है। वस्तुतः 26/27 मार्च को भारत जा रही हूँ, वर्धा विश्वविद्यालय व दिल्ली। उसकी तैयारी के चलते कुछ विलंब हो सकता है।  संभवतः वहाँ से लौट कर तुरंत यहीं बाँटूँगी। 


शीघ्र ही संगोष्ठी के चर्चा बिन्दु, निष्कर्ष व पारित प्रस्तावों सहित शेष जानकारियाँ भी दूँगी।तब तक हमारे मित्र प्रो. गेनादी श्लोम्पेर (इजरायल ) के कमरे की आँख से लिए ये चित्र देखें - 

























































































 







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